यज्ञमें शरीरको भी होमनेकी मेरी तैयारी है, और शक्ति है। लेकिन जबतक मैं इस सत्यका साक्षात्कार न कर लूं, तबतक मेरी अन्तरात्मा जिसे सत्य समझती है, उस काल्पनिक सत्यको अपना आधार मानकर, अपना दीपस्तम्भ समझकर, उसके सहारे अपना जीवन व्यतीत कर रहा हूँ । यद्यपि यह मार्ग तलवारकी धार पर चलने जैसा है, तो भी मुझे यह सरल-से-सरल लगा है । इस मार्ग पर चलते हुए अपनी भयंकर भूलें भी मुझे नगण्य-सी लगी हैं, क्योंकि वैसी भूलें करने पर भी मैं बच गया हूँ, और अपनी समझके अनुसार आगे बढ़ा हूँ । दूर-दूरसे विशुद्ध सत्यकी ईश्वरकी झाँकी भी ले रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है कि एक सत्य ही हैं, उसके अलावा दूसरा कुछ भी इस जगत में नहीं है । यह विश्वास किस प्रकार बढ़ता गया है, यदि मेरा जगत अर्थात् 'नवजीवन' इत्यादिके पाठक इसे जानकर मेरे प्रयोगोंके साझेदार बनना चाहें और उस सत्यकी झांकी भी मेरे साथ करना चाहें तो अवश्य करें। साथ ही, मैं यह भी अधिकाधिक मानने लगा हूँ कि जितना कुछ मेरे लिए सम्भव है, उतना एक बालकके लिए भी सम्भव है और इसके लिए मेरे पास सबल कारण हैं । सत्यकी शोधके साधन जितने कठिन हैं, उतने ही सरल भी हैं। वे अभिमानीको असम्भव मालूम होंगे और एक निर्दोष बालकको बिलकुल सम्भव लगेंगे। सत्यके शोधकको रजकणसे भी तुच्छ होकर रहना पड़ता है । सारा संसार रजकणोंको कुचलता है, पर सत्यका पुजारी तो जबतक इतना अल्प नहीं बनता कि रजकण भी उसे कुचल सकें, तबतक उसके लिए स्वतन्त्र सत्यकी झलक भी दुर्लभ है। यह चीज वशिष्ठ-विश्वामित्रके आख्यानमें स्वतन्त्र रीतिसे बताई गई है । ईसाई धर्म और इस्लाम भी इसी वस्तुको सिद्ध करते हैं ।
मैं जो प्रकरण लिखनेवाला हूँ, यदि उनमें पाठकोंको अभिमानका भास हो, तो उन्हें अवश्य ही समझ लेना चाहिए कि मेरी शोध में खामी है और मेरी झाँकियाँ मृगजलके समान हैं। भले ही मेरे समान अनेकोंका क्षय हो, पर सत्यकी जय हो । अल्पात्माको मापनेके लिए हम सत्यके आदर्शमें कमी कभी न करें ।
मैं चाहता हूँ कि मेरे लेखोंको कोई प्रमाणभूत न समझें। यही मेरी विनती है । मैं तो सिर्फ यह चाहता हूँ कि उनमें बताये गये प्रयोगोंको दृष्टान्तरूप मानकर सब अपने-अपने प्रयोग यथाशक्ति और यथामति करें। मुझे विश्वास है कि इस संकुचित क्षेत्र में आत्मकथाके मेरे लेखोंसे बहुत-कुछ मिल सकेगा, क्योंकि कहने योग्य एक भी बात मैं छिपाऊँगा नहीं । मुझे आशा है कि मैं अपने दोषोंका ख्याल पाठकों को पूरी तरह दे सकूंगा। मुझे सत्यके शास्त्रीय प्रयोगोंका वर्णन करना है, मैं कितना भला हूँ, इसका वर्णन करनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है । जिस गजसे स्वयं मैं अपनेको मापना चाहता हूँ और जिसका उपयोग हम सबको अपने-अपने विषयमें करना चाहिए, उसके अनुसार तो मैं अवश्य कहूँगा कि :
मो सम कौन कुटिल खल कामी
जिन तनु दियो ताहि बिसरायो
ऐसो नोनहरामी