२४. ‘प्याज-चोर’
चम्पारन हिन्दुस्तानके एक कोनेमें था। वहाँकी लड़ाईको अखबारोंसे इस तरह अलग रखा गया था कि बाहरसे देखनेवाले वहाँ कोई आते न थे। पर खेड़ाकी लड़ाई अखबारोंकी चर्चाका विषय बन चुकी थी।
गुजरातियोंको इस नई चीज में विशेष रस आने लगा था। वे पैसा लुटानेको तैयार थे। सत्याग्रहकी लड़ाई पैसेसे नहीं चल सकती, उसे पैसेकी आवश्यकता तो कमसे-कम रहती है। यह बात उनकी समझमें जल्दी नहीं आ रही थी। मना करने पर भी बम्बईके सेठोंने आवश्यकतासे अधिक पैसे दिये थे और लड़ाईके अन्त में उसमें से कुछ रकम बच गई थी।
दूसरी तरफ सत्याग्रही सेनाको भी सादगीका नया पाठ सीखना था। मैं यह तो नहीं कह सकता कि वे पूरा पाठ सीख गये थे, पर उन्होंने अपनी रहन-सहन में बहुत-कुछ सुधार कर लिया था।
पाटीदारोंके लिए भी यह लड़ाई नयी थी। गाँव-गाँव घूमकर लोगोंको इसका रहस्य समझाना पड़ता था।
सरकारी अधिकारी जनताके मालिक नहीं, बल्कि नौकर हैं; जनताके पैसेसे उन्हें तनख्वाह मिलती है——यह सब समझाकर उनका भय दूर करनेका काम मुख्य था। और निर्भय होने पर भी विनयके पालनका उपाय बताना और उसे गले उतारना लगभग असम्भव-सा प्रतीत होता था। अधिकारियोंका डर छोड़नेके बाद उनके द्वारा किये गये अपमानोंका बदला चुकानेकी इच्छा किसे नहीं होती! फिर भी यदि सत्याग्रही अविनयी बनता है, तो वह दूधमें जहर मिलनेके समान है। पाटीदार विनयका पाठ पूरी तरह पढ़ नहीं पाये, इसे में बाद में अधिक समझ पाया। मैं अनुभवसे इस परिणामपर पहुँचा हूँ कि विनय सत्याग्रहका कठिन-से कठिन अंश है। यहाँ विनयका अर्थ केवल सम्मानपूर्वक वचन कहना ही नहीं है। विनयसे तात्पर्य है, विरोधीके प्रति मनमें आदर, सरलभाव, उसके हितकी इच्छा और तदनुसार व्यवहार।
शुरूके दिनोंमें लोगों में खूब हिम्मत दिखाई देती थी। शुरू-शुरू में सरकारी कार्रवाई भी कुछ ढीली ही थी। लेकिन जैसे-जैसे लोगोंकी दृढ़ता बढ़ती मालूम हुई, वैसे-वैसे सरकारको भी अधिक उग्र कार्रवाई करनेकी इच्छा हुई। कुर्की करनेवालोंने लोगोंके पशु बेच डाले, घरमें से जो चाहा सो माल उठाकर ले गये। चौथाई जुर्मानेके नोटिस निकले। किसी-किसी गाँवकी सारी फसल जब्त कर ली गई। लोगोंमें घबराहट फैली। कुछने लगान जमा करा दिया। दूसरे मन-ही-मन यह चाहने लगे कि सरकारी अधिकारी उनका सामान जब्त करके लगान वसूल कर लें, तो भर पाये। कुछ मर-मिटनेवाले भी निकले।
इसी बीच शंकरलाल पारेखकी जमीनका लगान उनकी जमीनपर रहनेवाले आदमीने जमा करा दिया। इससे हाहाकार मच गया। शंकरलाल पारेखने वह जमीन जनताको देकर अपने आदमीसे हुई भूलका प्रायश्चित्त किया। इससे उनकी प्रतिष्ठाकी रक्षा हुई और दूसरोंके लिए एक उदाहरण प्रस्तुत हो गया।