भयभीत लोगोंको प्रोत्साहित करनेके लिए मोहनलाल पण्ड्याके नेतृत्व में मैंने एक ऐसे खेतमें खड़ी प्याजकी तैयार फसलको उतार लेनेकी सलाह दी, जो अनुचित रीतिसे जब्त किया गया था। मेरी दृष्टिमें इससे कानूनका भंग न होता था। लेकिन अगर कानून टूटता हो तो भी मैंने यह सुझाया कि मामूली-से लगानके लिए समूची तैयार फसलको जब्त करना कानूनन् ठीक होते हुए भी नीतिके विरुद्ध है और स्पष्ट लूट है, अतएव इस प्रकारकी जब्तीका अनादर करना हमारा धर्म है। लोगोंको स्पष्ट रूपसे समझा दिया था कि ऐसा करनेमें जेल जाने और जुर्माना होनेका खतरा है। मोहनलाल पण्ड्या तो यही चाहते थे। सत्याग्रहके अनुरूप किसी रीतिसे किसीके जेल गये बिना खेड़ाकी लड़ाई समाप्त हो जाये, यह चीज उन्हें अच्छी नहीं लग रही थी। उन्होंने इस खेतका प्याज खुदवानेका बीड़ा उठाया। सात-आठ आदमियोंने उनका साथ दिया।
सरकार उन्हें पकड़े बिना कैसे रहती? मोहनलाल पण्ड्या और उनके साथी पकड़े गये। इससे लोगोंका उत्साह बढ़ गया। जहाँ लोग जेल इत्यादिके विषय में निर्भय बन जाते हैं, वहाँ राजदण्ड लोगोंको दबाने के बदले उनमें शूरवीरता उत्पन्न करता है। अदालतमें लोगोंके दलके-दल मुकदमा देखनेको उमड़ पड़े। मोहनलाल पण्ड्याको और उनके साथियोंको थोड़े-थोड़े दिनोंकी कैद की सजा दी गई।[१] मैं मानता हूँ कि अदालतका फैसला गलत था। प्याज उखाड़नेका काम चोरीकी कानूनी व्याख्याकी सीमा में नहीं आता था। पर अपील करनेकी किसीकी वृत्ति ही न थी।
जेल जानेवालोंको पहुँचाने के लिए एक जुलूस उनके साथ हो गया, और उस दिनसे मोहनलाल पण्ड्याको लोगोंकी ओरसे ‘प्याज-चोर’ की सम्मानित पदवी प्राप्त हुई, जिसका उपभोग वे आजतक कर रहे हैं।
इस लड़ाईका कैसा और किस प्रकार अन्त हुआ, उसका वर्णन करके हम खेड़ा-प्रकरण समाप्त करेंगे।
२५. खेड़ाकी लड़ाईका अन्त
इस लड़ाईका अन्त विचित्र रीतिसे हुआ। यह तो साफ था कि लोग थक चुके थे। जो दृढ़ बने रहे, उन्हें पूरी तरह बरबाद होने देनेमें संकोच हो रहा था। मेरा झुकाव इस ओर था कि सत्याग्रहीके अनुरूप इसकी समाप्तिका कोई शोभास्पद मार्ग निकल आये, तो उसे अपनाना ठीक होगा। ऐसा एक अनसोचा उपाय सामने आ गया। नडियाद ताल्लुकेके तहसीलदारने सन्देशा भेजा कि अगर अच्छी स्थितिवाले पाटीदार लगान अदा कर दें, तो गरीबोंका लगान मुलतवी रहेगा। इस विषय में मैंने लिखित स्वीकृति माँगी और वह मिल गई। तहसीलदार अपनी तहसीलकी ही जिम्मेदारी ले सकता था। सारे जिलेकी जिम्मेदारी तो कलेक्टर ही ले सकता था। इसलिए मैंने कलेक्टर से पूछा। उनका जवाब मिला कि तहसीलदारने जो कहा है
- ↑ गांधीजीके सम्बन्धित भाषणके लिए देखिए खण्ड १४, पृष्ठ ४०२-४०४।