२६. एकताकी रट
जिन दिनों खेड़ाका आन्दोलन चल रहा था, उन दिनों यूरोपका महायुद्ध भी जारी ही था। वाइसरायने उसके सिलसिले में नेताओंको दिल्ली बुलाया था। मुझसे आग्रह किया गया था कि मैं भी उसमें हाजिर होऊँ। मैं बता चुका हूँ कि लार्ड चेम्सफोर्डके साथ मेरी मित्रता थी।
मैंने निमन्त्रण स्वीकार किया और मैं दिल्ली गया; किन्तु इस सभा में सम्मिलित होते समय मेरे मनमें एक संकोच था। मुख्य कारण तो यह था कि इस सभा में अली भाई[१], लोकमान्य और दूसरे नेता निमन्त्रित नहीं किये गये थे। उस समय अलीभाई जेलमें थे। उनसे मैं एक-दो बार ही मिला था, उनके बारेमें सुना बहुत था। उनकी सेवावृत्ति और बहादुरीकी सराहना सब कोई करते थे। हकीम साहबके सम्पर्कमें मैं नहीं आया था। स्व॰ आचार्य रुद्र और दीनबन्धु एन्ड्रयूजके मुँहसे उनकी बहुत प्रशंसा सुनी थी। कलकत्तेमें हुई मुस्लिम लीगकी बैठकके समय शुएब कुरेशी और बैरिस्टर ख्वाजासे मेरी जान-पहचान हुई थी। डा॰ अन्सारी और डा॰ अब्दुर्हमानके साथ भी जान-पहचान हो चुकी थी। मैं सज्जन मुसलमानोंकी संगतिके अवसर ढूंढ़ता रहता था, और जो पवित्र तथा देशभक्त माने जाते थे, उनसे जान-पहचान करके उनकी भावना जाननेकी तीव्र इच्छा मुझमें रहती थी। इसलिए वे अपने समाज में मुझे जहाँ-कहीं ले जाते वहाँ बिना किसी आनाकानीके मैं चला जाता था।
इस बातको तो मैं दक्षिण आफ्रिकामें ही समझ चुका था कि हिन्दू-मुसलमानके बीच सच्चा मित्रभाव नहीं है। मैं वहाँ ऐसे एक भी उपायको हाथसे जाने न देता था, जिससे दोनोंके बीचकी अनबन दूर हो। झूठी खुशामद करके अथवा स्वाभिमान खोकर उनको अथवा किसी औरको रिझाना मेरे स्वभावमें न था। लेकिन वहींसे मेरे दिलमें यह बात जमी हुई थी कि मेरी अहिंसाकी कसौटी और उसका विशाल प्रयोग इस एकताके सिलसिले में हो होगा। आज भी मेरी वह राय कायम है। ईश्वर प्रतिक्षण मुझे कसौटीपर कस रहा है। मेरा प्रयोग चालू ही है।
इस प्रकारके विचार लेकर मैं बम्बई बन्दरपर उतरा था। इसलिए मुझे इन दोनों भाइयोंसे मिलकर प्रसन्नता हुई। हमारा स्नेह बढ़ता गया। हमारी जानपहचान होनेके बाद तुरन्त ही अली भाइयोंको तो सरकारने जीते-जी दफना दिया था। मौलाना मुहम्मदअलीको जब इजाजत मिलती, तब वे बैतूल या छिन्दवाड़ा जेलसे मुझे लम्बे-लम्बे पत्र लिखा करते थे। मैंने उनसे मिलनेकी इजाजत सरकारसे माँगी थी, पर वह न मिल सकी।
अलीभाइयोंकी नजरबन्दीके बाद मुसलमान भाई मुझे कलकत्ता मुस्लिम लीगकी बैठकमें लिवा ले गये थे। वहाँ मुझसे बोलनेको कहा गया। मैं बोला। मैंने मुसलमानों को समझाया कि अलीभाइयोंको छुड़ाना उनका धर्म है। इसके बाद[२] वे मुझे अलीगढ़