लेकिन मैंने शुरूमें ही देख लिया कि यह सभा लम्बे समयतक टिक ही न सकेगी। इसके अलावा, सत्य और अहिंसापर जो जोर मैं देता था, वह कुछ लोगोंको अप्रिय मालूम हुआ। फिर भी शुरूके दिनों में यह काम धड़ल्लेके साथ आगे बढ़ा।
३०. वह अद्भुत दृश्य!
एक ओरसे रौलट कमेटी की रिपोर्टके विरुद्ध आन्दोलन बढ़ता गया, दूसरी ओरसे सरकार कमेटी की सिफारिशोंपर अमल करनेके लिए दृढ़ होती गई। रौलट विधेयक प्रकाशित हुआ। मैं एक ही बार धारासभाकी बैठक में गया हूँ——रौलट विधेयककी चर्चा सुनने। शास्त्रीजीने[१] अपना जोशीला भाषण किया, सरकारको चेतावनी दी। जिस समय शास्त्रीजीकी वाग्धारा बह रही थी, वाइसराय उनके सामने टकटकी लगाकर देख रहे थे। मुझे तो जान पड़ा कि इस भाषणका असर उनपर हुआ होगा। शास्त्रीजीकी भावना उमड़ी पड़ती थी।
सोये हुए आदमीको जगाया जा सकता है; किन्तु यदि जागनेवाला सोनेका बहाना करे, तो उसके कानपर ढोल बजानेसे भी क्या होगा? धारासभा में बिलोंकी चर्चाका स्वांग तो करना ही था। सरकारने वह किया। उसे जो काम करना था उसका निश्चय तो हो ही चुका था। इसलिए शास्त्रीजीको चेतावनी व्यर्थ सिद्ध हुई।
मेरी तूतीकी आवाजको तो भला कौन सुनता? मैंने वाइसरायसे मिलकर उन्हें बहुत समझाया। व्यक्तिगत पत्र लिखे। सार्वजनिक पत्र लिखे। मैंने उनमें स्पष्ट बता दिया कि सत्याग्रहको छोड़कर मेरे पास दूसरा कोई मार्ग नहीं है। लेकिन सब व्यर्थ हुआ।[२]
अभी विधेयक गजटमें नहीं छपा था। मेरा शरीर कमजोर था, फिर भी मैंने लम्बी यात्राका खतरा उठाया। मुझमें ऊँची आवाजसे बोलनेकी शक्ति नहीं आई थी। खड़े रहकर बोलनेकी शक्ति जो गई, सो अभीतक लौटी नहीं है। थोड़ी देर खड़े रहकर बोलनेपर सारा शरीर काँपने लगता था और छाती तथा पेटमें दर्द मालूम होने लगता था।[३] पर मुझे लगा कि मद्राससे आया हुआ निमन्त्रण स्वीकार करना ही चाहिए।
दक्षिणके प्रान्त उस समय भी मुझे घर सरीखे मालूम होते थे। दक्षिण आफ्रिकाके कारण तमिल-तेलुगु आदि दक्षिण प्रदेशके लोगोंपर मेरा अधिकार है, ऐसा मैं मानता आया हूँ। और, अपनी इस मान्यता में मैंने थोड़ी भी भूल की है, ऐसा मुझे आजतक प्रतीत नहीं हुआ। निमन्त्रण स्व॰ कस्तूरीरंगा आयंगारकी ओरसे मिला था। मद्रास जानेपर पता चला कि इस निमन्त्रणके मूलमें राजगोपालाचारी थे।