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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३८१

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

पर इस विषयको एक अलग प्रकरण देना पड़ेगा। ७ अप्रैलकी रातको मैं दिल्ली-अमृतसर जानेके लिए रवाना हुआ। ८ को मथुरा पहुँचनेपर कुछ ऐसी भनक कान तक आई कि शायद मुझे गिरफ्तार करेंगे। मथुराके बाद एक स्टेशनपर गाड़ी रुकती थी। वहां आचार्य गिडवानी मिले। उन्होंने मेरे पकड़े जानेके बारेमें पक्की खबर दो और जरूरत हो, तो अपनी सेवा अर्पण करनेके लिए कहा। मैंने धन्यवाद दिया और कहा कि जरूरत पड़नेपर आपकी सेवा नहीं भूलूँगा।

पलवल स्टेशन आनेके पहले ही पुलिस अधिकारीने मेरे हाथपर आदेश-पत्र[] रखा। आदेश इस प्रकारका था: “आपके पंजाबमें प्रवेश करनेसे अशान्ति बढ़नेका डर है, अतएव आप पंजाबकी सीमा में प्रवेश न करें।” आदेश-पत्र देकर पुलिसने मुझे उतर जानेको कहा। मैंने उतरने से इनकार किया और कहा: “मैं अशान्ति बढ़ाने नहीं, बल्कि निमन्त्रण पाकर अशान्ति घटानेके लिए जाना चाहता हूँ। इसलिए खेद है कि मैं इस आदेशका पालन नहीं कर सकूँगा।”

पलवल आया। महादेव मेरे साथ थे। उन्हें दिल्ली जाकर श्रद्धानन्दजीको खबर देने और लोगोंको शान्त रखनेके लिए कहा। मैंने महादेवसे यह भी कहा कि वे लोगोंको बता दें कि सरकारी आदेशका अनादर करनेके कारण जो सजा होगी उसे भोगनेका मैंने निश्चय कर लिया है, साथ ही लोगों को यह समझानेके लिए कहा कि मुझे सजा होने पर भी उनके शान्त रहने में ही हमारी जीत है।

मुझे पलवल स्टेशनपर उतार लिया गया और पुलिसके हवाले किया गया। फिर दिल्लोसे आनेवाली किसी ट्रेनके तीसरे दर्जेके डिब्बे में मुझे बैठाया गया और साथमें पुलिसका दल भी बैठा। मथुरा पहुँचनेपर मुझे पुलिसकी बारकमें ले गये। मेरा क्या होगा और मुझे कहाँ ले जाना है, सो कोई पुलिस अधिकारी मुझे बता न सका। सुबह ४ बजे मुझे जगाया गया और बम्बईकी ओर जानेवाली मालगाड़ीमें बैठा दिया गया। दोपहरको मुझे सवाई माधोपुर स्टेशनपर उतारा गया। वहाँ बम्बईकी डाक गाड़ी में लाहोरसे इन्स्पेक्टर बोरिंग आये। उन्होंने मेरा चार्ज लिया। अब मुझे पहले दर्जे में बैठाया गया। साथ में साहब बैठे। अभीतक मैं साधारण कैदी था, अब ‘जेंटलमैन कैदी’ माना जाने लगा। साहबने सर माइकल ओडायरका बखान शुरू किया। उन्हें मेरे विरुद्ध तो कोई शिकायत है ही नहीं, किन्तु मेरे पंजाब जाने से उन्हें अशान्तिका पूरा भय है, आदि बातें कहकर मुझे स्वेच्छासे लौट जाने और फिर पंजाबकी सीमा पार न करनेका अनुरोध किया। मैंने उनसे कह दिया कि मुझसे इस आज्ञाका पालन नहीं हो सकेगा, और मैं स्वेच्छा से वापस जाने को तैयार नहीं। अतएव साहबने लाचार होकर कानूनी कार्रवाई करने को बात कही। मैंने पूछा, “लेकिन यह तो कहिए कि आप मेरा क्या करना चाहते हैं?” वे बोले, “मुझे पता नहीं है। मैं दूसरे आदेशकी राह देख रहा हूँ? अभी तो मैं आपको बम्बई ले जा रहा हूँ।?[]

  1. देखिए खण्ड १५, पृ४ २१४।
  2. गिरफ्तारीके पूरे विवरणके लिए देखिए खण्ड १५, १४ २३५-३९।