३२. वह सप्ताह——२
मैं कमिश्नर ग्रिफिथ साहबके कार्यालय में गया। उनकी सीढ़ीके पास जहाँ देखो वहीं हथियारबन्द सैनिक बैठे हुए थे; मानो लड़ाईको तैयारी हो रही हो। बरामदे में भी हलचल मची हुई थी। मैं खबर देकर आफिसमें पैठा, तो देखा कि कमिश्नरके पास श्री बोरिंग बैठे हुए हैं।
मैंने कमिश्नरसे उस दृश्यका वर्णन किया, जिसे मैं अभी-अभी देखकर आया था। उन्होंने संक्षेप में जवाब दिया: “मैं नहीं चाहता था कि जुलूस फोर्टकी ओर जाये। वहाँ जानेपर उपद्रव हुए बिना न रहता। और मैंने देखा कि लोग लौटनेवाले न थे। इसलिए सिवा घोड़े दौड़ानेके मेरे पास दूसरा कोई उपाय न था।”
मैंने कहा, “किन्तु उसका परिणाम तो आप जानते थे। लोग घोड़ोंके पैरों तले दबनेसे बच नहीं सकते थे। मेरा तो ख्याल है कि घुड़सवारोंकी टुकड़ी भेजनेकी आवश्यकता ही नहीं थी।”
साहब बोले, “आप इसे जान नहीं सकते। आपकी शिक्षाका लोगोंपर क्या असर हुआ है, इसका पता आपकी अपेक्षा हम पुलिसवालोंको अधिक रहता है। हम पहलेसे कड़ी कार्रवाई न करें, तो अधिक नुकसान हो सकता है। मैं आपसे कहता कि लोग आपके काबूमें भी रहनेवाले नहीं हैं। वे कानूनको तोड़नेकी बात तो झट समझ जायेंगे, लेकिन शान्तिकी बात समझना उनकी शक्तिसे परे है। आपके हेतु अच्छे हैं, लेकिन लोग उन्हें समझेंगे नहीं। वे तो अपने स्वभावका ही अनुसरण करेंगे।’
मैंने जवाब दिया, “किन्तु आपके और मेरे बीच जो भेद है, सो इसी बातमें है। मैं कहता हूँ कि लोग स्वभावसे लड़ाकू नहीं, बल्कि शान्तिप्रिय हैं।”
हममें बहस होने लगी। आखिर साहबने कहा, “अच्छी बात है, यदि आपको विश्वास हो जाये कि लोग आपकी शिक्षाको समझे नहीं हैं, तो आप क्या करेंगे?”
मैंने उत्तर दिया, “यदि मुझे इसकी प्रतीति हो जाये, तो मैं इस लड़ाईको मुलतवी कर दूँगा।”
“मुलतवी करनेका मतलब क्या? आपने तो श्री बोरिंगसे कहा है कि मुक्त होनेपर आप तुरन्त वापस पंजाब जाना चाहते हैं।”
“हाँ, मेरा इरादा तो लौटती ट्रेनसे ही वापस जानेका था, पर अब आज तो जाना हो ही नहीं सकता।”
“आप धैर्यसे काम लेंगे, तो आपको और अधिक बातें मालूम होंगी। आप जानते हैं, अहमदाबादमें क्या हो रहा है? अमृतसरमें क्या हुआ है? लोग सब कहीं पागलसे हो गये हैं। मुझे भी पूरा पता नहीं है। कई स्थानोंमें तार भी काटे गये हैं। मैं तो कहता हूँ कि इस सारे उपद्रवकी जवाबदेही आपके सिरपर है।”
मैंने कहा: “मुझे जहाँ अपनी जिम्मेदारी महसूस होगी वहाँ मैं उसे अपने ऊपर लिये बिना नहीं रहूँगा। अहमदाबादमें लोग थोड़ा भी उपद्रव करें, तो मुझे आश्चर्यं और दुःख होगा। अमृतसर के बारेमें मैं कुछ नहीं जानता। वहाँ तो मैं कभी