स्व॰ रमणभाई आदि नागरिक मेरे पास आये और मुझे सत्याग्रह मुलतवी करने के लिए मनाने लगे। पर मुझे मनानेकी आवश्यकता ही नहीं रही थी। मैंने स्वयं निश्चय कर लिया था कि जब तक लोग शान्तिका पाठ न सीख लें, तब तक सत्याग्रह मुलतवी रखा जाये। इससे वे प्रसन्न हुए।
कुछ मित्र नाराज भी हुए। उनका खयाल यह था कि अगर मैं सब कहीं शान्तिकी आशा रखूँ और सत्याग्रहकी यही शर्त रहे, तो बड़े पैमाने पर सत्याग्रह कभी चल ही नहीं सकता। मैंने अपना मतभेद प्रकट किया। जिन लोगों में काम किया गया है, जिनके द्वारा सत्याग्रह करनेकी आशा रखी जाती है, वे यदि शान्तिका पालन न करें, तो अवश्य ही सत्याग्रह कभी चल नहीं सकता। मेरी दलील यह थी कि सत्याग्रही नेताओंको इस प्रकारकी मर्यादित शान्ति बनाये रखनेकी शक्ति प्राप्त करनी चाहिए। अपने इन विचारोंको मैं आज भी बदल नहीं सका हूँ।
३३. हिमालय जैसी भूल
अहमदाबादकी सभाके बाद मैं तुरन्त ही नडियाद गया। ‘हिमालय जैसी भूल’ नामक जो शब्द-प्रयोग प्रचलित हुआ है, उसका उपयोग मैंने पहली बार नडियाद में किया। अहमदाबादमें ही मुझे अपनी मूल मालूम पड़ने लगी थी। पर नडियाद में वहाँकी स्थितिका विचार करके और यह सुनकर कि खेड़ा जिलेके बहुत-से लोग पकड़े गये हैं, जिस सभामें में घटित घटना पर भाषण कर रहा था, उसमें मुझे अचानक यह ख्याल आया कि खेड़ा जिलेके और ऐसे दूसरे लोगोंको कानूनका सविनय भंग करनेके लिए निमन्त्रित करनेमें मैंने जल्दबाजी की, भूल की, और वह भूल मुझे हिमालय जैसी मालूम हुई। इस प्रकार अपनी भूल कबूल करनेके लिए मेरी खूब हँसी उड़ाई गई। फिर भी अपनी इस स्वीकृतिके लिए मुझे कभी पश्चात्ताप नहीं हुआ। मैंने हमेशा यह माना है कि जब हम दूसरोंके गज-जैसे दोषोंको रजवत् मानकर देखते हैं, और अपने रजवत् प्रतीत होनेवाले दोषोंको पहाड़ जैसा देखना सीखते हैं, तभी हमें अपने और पराये दोषोंका ठीक-ठीक अन्दाज हो पाता है। मैंने यह भी माना है कि सत्याग्रही बननेकी इच्छा रखनेवालेको तो इस साधारण नियमका पालन बहुत अधिक सूक्ष्मताके साथ करना चाहिए।
अब हम यह देखें कि हिमालय जैसी प्रतीत होनेवाली वह भूल क्या थी। कानूनका सविनय भंग उन्हीं लोगों द्वारा किया जा सकता है, जिन्होंने विनयपूर्वक और स्वेच्छासे कानूनका सम्मान किया हो। अधिकतर तो हम कानूनका पालन इसलिए करते हैं कि उसे तोड़ने पर जो सजा होती है, उससे हम डरते हैं। और, यह बात उस कानून पर विशेष रूपसे घटित होती है, जिसमें नीति-अनीतिका प्रश्न नहीं होता। कानून हो चाहे न हो, जो लोग भले माने जाते हैं, वे एकाएक कभी चोरी नहीं करते। फिर भी रातमें साइकल पर बत्ती जलानेके नियमसे बच निकलनेमें भले आदमियोंको भी क्षोभ नहीं होता, और ऐसे नियमका पालन करनेकी कोई सलाह