किन्तु मुझे यह जिम्मेदारी अधिक दिन तक उठानी नहीं पड़ी । सरकारकी
मेहरबानीसे 'क्रॉनिकल' बन्द हो गया ।
जो लोग 'क्रॉनिकल' की व्यवस्थाके कर्ताधर्ता थे, वे ही 'यंग इंडिया' की व्यवस्था पर भी निगरानी रखते थे । वे थे उमर सोबानी और शंकरलाल बैंकर । इन दोनों सज्जनोने मुझे सुझाया कि मैं 'यंग इंडिया' की जिम्मेदारी अपने सिर लूं । और 'क्रॉनिकल' के अभाव की थोड़ी पूर्ति करनेके विचारसे 'यंग इंडिया' को हफ्ते में एक बारके बदले दो बार निकालना उन्हें और मुझे ठीक लगा।[१] मुझे लोगोंको सत्याग्रहका रहस्य समझानेका उत्साह था। पंजाबके बारेमें मैं और कुछ नहीं तो, कमसे कम उचित आलोचना तो कर ही सकता था, और उसके पीछे सत्याग्रहरूपी शक्ति है, उसका पता सरकारको था ही । अतएव इन मित्रोंकी सलाह मैंने स्वीकार कर ली ।
किन्तु अंग्रेजीके द्वारा जनताकी सत्याग्रहकी शिक्षा कैसे दी जा सकती थी ? गुजरात[२] मेरा मुख्य कार्य-क्षेत्र था । भाई इन्दुलाल याज्ञिक इस समय उमर सोबानी और शंकरलाल बैंकरकी मण्डलीमें थे । वे 'नवजीवन' नामक गुजराती मासिक चला रहे थे । उसका खर्च भी उक्त मित्र पूरा करते थे । भाई इन्दुलालने और उन मित्रोंने यह पत्र मुझे सौंप दिया और भाई इन्दुलालने इसमें काम करना भी स्वीकार किया । इस मासिकको साप्ताहिक बनाया गया ।
इस बीच 'क्रॉनिकल' फिर जी उठा, इसलिए 'यंग इंडिया' पुनः साप्ताहिक हो गया और मेरी सलाहके कारण उसे अहमदाबाद ले जाया गया। दो पत्रोंके अलग-अलग स्थानोंसे निकलने में खर्च अधिक होता था और मुझे अधिक कठिनाई होती थी । 'नवजीवन' तो अहमदाबादसे ही निकलता था । ऐसे पत्रोंके लिए स्वतन्त्र छापाखाना होना चाहिए, इसका अनुभव मुझे 'इंडियन ओपिनियन' के सिलसिले में हो ही चुका था । इसके अतिरिक्त, उस समयके अखबारोंके कानून ऐसे थे कि मैं जो विचार प्रगट करना चाहता था, उन्हें व्यापारिक दृष्टिसे चलनेवाले छापाखानोंके मालिक छापने में हिचकिचाते थे । अपना स्वतन्त्र छापाखाना खड़ा करनेका यह भी एक प्रबल कारण था । यह काम अहमदाबाद में ही सरलतासे हो सकता था अतएव यंग इंडिया' को अहमदाबाद ले गये ।
इन पत्रोंके द्वारा मैंने जनताको यथाशक्ति सत्याग्रहको शिक्षा देना शुरू किया । पहले दोनों पत्रोंकी थोड़ी ही प्रतियाँ खपती थीं। लेकिन बढ़ते-बढ़ते वे चालीस हजारके आसपास पहुँच गई। 'नवजीवन' के ग्राहक एकदम बढ़े, जब कि 'यंग इंडिया' के धीरे-धीरे । मेरे जेल जानेके बाद इसमें कमी हुई और आज दोनोंकी ग्राहक संख्या ८,००० से नीचे चली गई है।
इन पत्रोंमें विज्ञापन न लेनेका मेरा आग्रह शुरूसे ही था। मैं मानता हूँ कि
इससे कोई हानि नहीं हुई, और इस प्रथाके कारण पत्रोंके विचार-स्वातन्त्र्यको रक्षा करनेमें बहुत मदद मिली ।