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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३८९

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

इन पत्रों द्वारा मैं अपनी शान्ति प्राप्त कर सका। क्योंकि यद्यपि मैं सविनय कानून-भंगको तुरन्त ही शुरू नहीं कर सका, फिर भी मैं अपने विचार स्वतन्त्रता- पूर्वक प्रकट कर सका और जो लोग सलाह और सुझावके लिए मेरी ओर देख रहे थे, उन्हें आश्वासन दे सका। मेरा ख्याल है कि दोनों पत्रोंने उस कठिन समयमें जनताकी अच्छी सेवा की और फौजी कानूनके जुल्मको हलका करनेमें हाथ बँटाया ।

 

३५. पंजाब में

पंजाब में जो कुछ हुआ, उसके लिए अगर सर माइकल ओडायरने मुझे गुनह- गार ठहराया था, तो वहाँ कोई कोई नवयुवक फौजी कानूनके लिए भी मुझे गुनह- गार ठहराने में न हिचकिचाते थे । क्रोधावेशसे भरे इन नवयुवकोंकी दलील यह थी कि यदि मैंने सविनय कानून-भंगको मुलतवी न किया होता, तो जलियाँवाला बागका कत्ले-आम कभी न होता और न फौजी कानून ही जारी हुआ होता। किसी-किसीने तो यह धमकी भी दी कि मेरे पंजाब जानेपर मुझे मारे बिना न छोड़ेंगे ।

किन्तु मुझे तो अपना कदम इतना उपयुक्त मालूम होता था कि उसके कारण समझदार आदमियों में गलतफहमी होनेकी सम्भावना ही न थी ।

मैं पंजाब जानेके लिए अधीर हो रहा था। मैंने पंजाब कभी देखा न था । अपनी आँखोंसे जो कुछ देखनेको मिले, वह देखनेकी मेरी तीव्र इच्छा थी । मुझे बुलानेवाले डा० सत्यपाल, डा० किचूल तथा पं० रामभजदत्त चौधरीको मैं देखना चाहता था। वे जेलमें थे । पर मुझे पूरा विश्वास था कि सरकार उन्हें लम्बे समय तक जेलमें रख ही नहीं सकेगी। मैं जब-जब बम्बई जाता, तब-तब बहुत-से पंजाबी मुझसे मिला करते थे। मैं उन्हें प्रोत्साहन देता था, जिससे वे प्रसन्न होते थे । इस समय मुझमें विपुल आत्मविश्वास था ।

लेकिन मेरा जाना टलता जाता था । वाइसराय लिखाते रहते थे कि 'अभी जरा देर है ।

इस बीच हंटर कमेटी आई। उसे फौजी कानूनके दिनोंमें पंजाबके अधिकारियों द्वारा किये गये कारनामोंकी जाँच करनी थी । दीनबन्धु एन्ड्रयूज वहाँ पहुँच गये थे । उनके पत्रोंमें हृदयद्रावक वर्णन होते थे । उनके पत्रोंकी ध्वनि यह थी कि अखबारोंमें जो कुछ छपता था, फौजी कानूनका जुल्म उससे कहीं अधिक था । पत्रोंमें मुझे पंजाब पहुँचनेका आग्रह किया गया। दूसरी तरफ मालवीयजीके भी तार आ रहे थे कि मुझे पंजाब पहुँचना चाहिए। इसपर मैंने वाइसरायको फिर तार दिया। उत्तर मिला : आप फलाँ तारीखको जा सकते हैं । " मुझे तारीख ठीक याद नहीं है, पर बहुत

करके वह १७ अक्तूबर थी ।[]

  1. १. तारोख १५ होनी चाहिए। देखिए खण्ड १६, पृष्ठ २०९ की पादटिप्पणी ३ ।