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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३९१

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

इस कमेटीकी रिपोर्ट[] तैयार करनेका काम भी मुझे ही सौंपा गया था। जो यह जानना चाहते हैं कि पंजाब में किस तरहसे जुल्म हुए थे, उन्हें यह रिपोर्ट अवश्य पढ़नी चाहिए। इस रिपोर्टके बारेमें मैं इतना कह सकता हूँ कि उसमें जान-बूझकर एक भी जगह अतिशयोक्ति नहीं हुई है । जितनी हकीकतें दी गई हैं, उनके लिए उसमें प्रमाण भी प्रस्तुत किये गये हैं। इस रिपोर्टमें जितने प्रमाण दिये गये हैं, उनसे अधिक कमेटीके पास मौजूद थे। जिसके विषयमें तनिक भी शंका थी, ऐसी एक भी बात रिपोर्ट में नहीं दी गई। इस तरह केवल सत्यको ही ध्यानमें रखकर लिखी हुई रिपोर्टसे पाठक देख सकेंगे कि ब्रिटिश राज्य अपनी सत्ताको दृढ़ बनाये रखनेके लिए किस हद तक जा सकता है । कैसे अमानुषिक काम कर सकता है। जहाँ तक मैं जानता हूँ, इस रिपोर्टकी एक भी बात आज तक झूठ साबित नहीं हुई ।

 

३६. खिलाफतके बदले गोरक्षा

अब थोड़ी देरके लिए पंजाबके हत्याकाण्डको छोड़ दें ।

कांग्रेसकी तरफसे पंजाबको डायरशाहीको जाँच चल रही थी। इतनेमें एक सार्वजनिक निमन्त्रण मेरे हाथमें आया । उसमें स्व० हकीम साहब और भाई आसफ- अलीके नाम थे । उसमें यह भी लिखा था कि सभा में श्रद्धानन्दजी उपस्थित रहने- वाले हैं। मुझे कुछ ऐसा ख्याल है कि वे उप-सभापति थे । यह निमन्त्रण दिल्लीमें खिलाफतके सम्बन्ध में उत्पन्न परिस्थितिका विचार करनेवाली और सन्धिके उत्सव में सम्मिलित होने या न होने का निर्णय करनेवाली हिन्दू-मुसलमानोंकी एक संयुक्त सभामें उपस्थित होने का था । मुझे कुछ ऐसा याद है कि यह सभा नवम्बर महीने में हुई थी । इस निमन्त्रण में यह लिखा था कि सभामें केवल खिलाफत के प्रश्नकी ही चर्चा नहीं होगी, बल्कि गोरक्षाके प्रश्नपर भी विचार होगा, और यह कि गोरक्षा साधनेका यह एक सुन्दर अवसर बनेगा। मुझे यह वाक्य चुभा । इस निमन्त्रणपत्रका उत्तर देते हुए मैंने लिखा कि मैं उपस्थित होनेकी कोशिश करूँगा और यह भी लिखा कि खिलाफत और गोरक्षाको एक साथ मिलाकर उन्हें परस्पर सौदेका सवाल नहीं बनाना चाहिए। हर प्रश्नका विचार उसके गुण-दोषकी दृष्टिसे किया जाना चाहिए।

मैं समामें हाजिर रहा।सभामें उपस्थिति अच्छी थी। बादमें जिस तरह हजारों लोग उमड़ने लगे थे, वैसा कोई दृश्य वहाँ नहीं था । इस सभा में श्रद्धानन्दजी उपस्थित थे। मैंने उनके साथ उक्त विषयपर चर्चा कर ली। उन्हें मेरी बात जँची और उसे पेश करनेका भार उन्होंने मुझपर डाला । हकीम साहबके साथ भी मैंने बात कर ली थी। मेरा कहना यह था कि दोनों प्रश्नोंपर उनके अपने गुण- दोषकी दृष्टिसे विचार करना चाहिए। यदि खिलाफत के प्रश्न में सार हो, उसमें सरकारकी ओरसे अन्याय हो रहा हो, तो हिन्दुओंको मुसलमानोंका साथ देना चाहिए

 
  1. १. देखिए खण्ड १७, पृष्ठ १२८-३२२ ।