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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३९३

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

गहरा असर पड़ा है। मंचपर तो मुझे सम्पूर्ण समर्थन मिला और मेरी हिमायतमें एकके बाद एक भाषण होने लगे । नेतागण यह देख सके कि ब्रिटिश मालके बहिष्कार का प्रस्ताव पास करनेसे एक भी हेतु सिद्ध नहीं होगा। हाँ, हँसी काफी होगी । सारी सभामें शायद ही कोई ऐसा आदमी देखनेमें आता था, जिसके शरीर पर कोई- न-कोई ब्रिटिश वस्तु न हो। इतना तो अधिकांश लोग समझ गये कि जो बात सभामें उपस्थित लोग भी नहीं कर सकते, उसे करनेका प्रस्ताव पास करनेसे लाभके बदले हानि ही होगी ।

मौलाना हसरत मोहानीने अपने भाषण में कहा, "हमें आपके विदेशी वस्त्रके बहिष्कारसे सन्तोष हो ही नहीं सकता । कब हम अपनी जरूरतका सब कपड़ा पैदा कर सकेंगे और कब विदेशी वस्त्रका बहिष्कार होगा ? हमें तो ऐसी कोई चीज चाहिए, जिसका प्रभाव ब्रिटिश जनतापर तत्काल पड़े। आपका बताया हुआ बहिष्कार भी चाहे रहे, पर इससे ज्यादा तेज कोई चीज आप हमें बताइए । " मैं यह भाषण सुन रहा था। मुझे लगा कि विदेशी वस्त्रके बहिष्कारके अलावा कोई दूसरी नई चीज सुझानी चाहिए। उस समय मैं तो स्पष्ट रूपसे जानता था कि विदेशी वस्त्रका बहिष्कार तुरन्त नहीं हो सकता। यदि हम चाहें तो सम्पूर्ण रूपसे खादी उत्पन्न करनेकी शक्ति हममें है, इस बातको मैं जिस तरह बाद में देख सका, उस तरह उस समय नहीं देख सका था । केवल मिलें तो दगा दे जायेंगी, यह मैं उस समय भी जानता था । जब मौलाना साहबने अपना भाषण पूरा किया, तब मैं जवाब देनेके लिए तैयार हो रहा था ।

मुझे कोई उर्दू या हिन्दी शब्द तो नहीं सूझा। मुसलमानोंकी ऐसी खास सभामें तर्कयुक्त भाषण करनेका मेरा यह पहला अनुभव था । कलकत्ते में मुस्लिम लीग की सभामें मैं बोला था, किन्तु वह तो कुछ मिनटोंका और दिलको छूनेवाला भाषण था । पर यहाँ तो मुझे विरुद्ध मतवाले समाजको समझाना था। लेकिन मैंने हिचक छोड़ दी थी। मुझे दिल्लीके मुसलमानोंके सामने शुद्ध उर्दूमें लच्छेदार भाषण नहीं करना था, बल्कि अपना मंशा टूटी-फूटी हिन्दीमें समझा देना था। यह काम मैं भलीभाँति कर सका। यह सभा इस बातका प्रत्यक्ष प्रमाण थी कि हिन्दी-उर्दू ही राष्ट्र-भाषा बन सकती है। अगर मैंने अंग्रेजीमें भाषण किया होता, तो मेरी गाड़ी आगे न बढ़ती; और मौलाना साहबने जो चुनौती मुझे दी, उसे देनेका मौका न आया होता, और आया भी होता तो मुझे उसका जवाब न सूझता ।

उर्दू या हिन्दी शब्द ध्यानमें न आनेसे मैं शरमाया, पर मैंने जवाब तो दिया ही । मुझे 'नान-को-ऑपरेशन' शब्द सुझा । जब मौलाना भाषण कर रहे थे, तब मैं यह सोच रहा था कि मौलाना खुद कई मामलोंमें जिस सरकारका साथ दे रहे हैं, उस सरकारके विरोधकी बात करना उनके लिए बेकार है । मुझे लगा कि जब तलवारसे सरकारका विरोध नहीं करना है, तो उसका साथ न देनेमें ही सच्चा विरोध है । और फलतः मैंने 'नान-को-ऑपरेशन' शब्दका प्रयोग पहली बार इस सभामें किया । अपने भाषण में मैंने इसके समर्थनमें अपनी दलीलें दीं। उस समय मुझे इस बातका