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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/३९६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

आघात पहुँचेगा । " मैंने लोकमान्य और देशबन्धुके साथ विचार-विमर्श किया। श्री जिन्नासे मिला। किसी तरह कोई रास्ता निकलता न था । मैंने अपनी वेदना मालवीय- जीके सामने रखी : " समझौते के कोई लक्षण मुझे दिखाई नहीं देते । यदि मुझे अपना प्रस्ताव रखना ही पड़ा, तो अन्तमें मत तो लिये ही जायेंगे । पर यहाँ मत ले सकनेकी कोई व्यवस्था मैं नहीं देख रहा हूँ । आज तक हमने भरी सभामें हाथ उठवाये हैं। हाथ उठाते समय दर्शकों और प्रतिनिधियोंके बीच कोई भेद नहीं रहता । ऐसी विशाल सभामें मत गिननेकी कोई व्यवस्था हमारे पास नहीं होती । अतएव मुझे अपने प्रस्तावपर मत लिखवाने हों, तो भो इसकी सुविधा नहीं है ।" लाला हरकिशनलालने यह सुविधा सन्तोषजनक रीतिसे कर देनेका जिम्मा लिया। उन्होंने कहा, “ मत लेने के दिन दर्शकों को नहीं आने देंगे। केवल प्रतिनिधि हो आयेंगे, और वहाँ मतोंकी गिनती करा देना मेरा काम होगा । पर आप कांग्रेसकी बैठक में अनुपस्थित तो रह ही नहीं सकते।" आखिर मैं हार गया और मैंने अपना प्रस्ताव तैयार किया। बड़े संकाचसे मैंने उसे पेश करना कबूल किया। श्री जिन्ना और मालवीयजी उसका समर्थन करनेवाले थे । भाषण हुए। मैं देख रहा था कि यद्यपि हमारे मतभेद में कहीं कटुता नहीं थी, भाषणों में भी दलीलोंके सिवा और कुछ नहीं था, फिर भी सभा जरा-सा भी मतभेद सहन नहीं कर सकती थी और नेताओंके मतभेदसे उसे दुःख हो रहा था । सभाको तो नेताओंका एकमत चाहिए था ।

जब भाषण हो रहे थे उस समय भी मंचपर मतभेद मिटानेकी कोशिशें चल रही थीं। एक दूसरे के बीच चिट्ठियाँ आ-जा रही थीं । मालवीयजी जैसे भी बने, समझौता करानेका प्रयत्न कर रहे थे। इतनेमें जयरामदासने मेरे हाथपर अपना सुझाव रखा और सदस्योंको मत देनेके संकटसे उबार लेनेके लिए बहुत मीठे शब्दों में मुझसे प्रार्थना की। मुझे उनका सुझाव पसन्द आया । मालवीयजीकी दृष्टि तो चारों ओर आशाकी खोज में घूम हो रही थी । मैंने कहा : "यह सुझाव दोनों पक्षोंको पसन्द आने लायक मालूम होता है ।" मैंने उसे लोकमान्यको दिखाया। उन्होंने कहा, " दासको पसन्द आ जाये, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं । ” देशबन्धु पिघले । उन्होंने विपिनचन्द्र पालकी तरफ देखा । मालवीयजीको पूरी आशा बँध गई। उन्होंने परची हाथसे छीन ली। अभी देशबन्धुके मुंहसे हाँ का शब्द पूरा निकल भी नहीं पाया था कि वे बोल उठे : " सज्जनो, आपको जानकर खुशी होगी कि समझौता हो गया है । " फिर क्या था ? तालियोंकी गड़गड़ाहट से मण्डप गूंज उठा और लोगोंके चेहरों पर जो गम्भीरता थी, उसके बदले खुशी चमक उठी ।

यह प्रस्ताव' []क्या था, इसकी चर्चाकी यहाँ आवश्यकता नहीं । यह प्रस्ताव किस तरह स्वीकृत हुआ, इतना ही इस सम्बन्धमें बतलाना मेरे इन प्रयोगोंका विषय है । समझौतेने मेरी जिम्मेदारी बढ़ा दी ।

 
  1. १.अमृतसर कांग्रेस में गांधीजीके भाषण, प्रस्ताव और संशोधनोंके लिए देखिए खण्ड १६, पृष्ठ ३६६-७१ ।