पिताजीको धन इकट्ठा करनेका लोभ कभी नहीं रहा, इसलिए हम भाइयोंके लिए वे नाम-चारकी सम्पत्ति छोड़ गये थे ।
पिताजीका शिक्षण केवल उनका अनुभव ही था। आजकल जिसे हम गुजरातीकी पाँचवीं किताबका ज्ञान कहते हैं, उन्होंने उतनी ही शिक्षा पाई होगी । इतिहास और भूगोलका ज्ञान तो उन्हें मिला ही नहीं था। फिर भी उनका व्यावहारिक ज्ञान इतने ऊँचे दर्जेका था कि सूक्ष्मसे सूक्ष्म प्रश्नोंको सुलझाने या हजार-हजार आदमियों से काम लेते हुए भी उन्हें कोई अड़चन नहीं लगती थी । धार्मिक शिक्षा नहीं के बराबर थी, पर मन्दिरोंमें जाने और कथा आदि सुननेसे असंख्य हिन्दुओंको जो धर्म-ज्ञान सहज ही मिल जाता है वह उन्हें भी मिला था । जीवनके अन्तिम वर्षमें कुटुम्बके निकट परिचित एक ब्राह्मण विद्वान[१]की सलाहसे उन्होंने गीताका पाठ शुरू कर दिया था और वे पूजाके समय नित्य थोड़े-बहुत श्लोकोंका उच्च स्वरसे पाठ कर लिया करते थे ।
मेरे मन पर माताके साध्वी स्त्री होनेकी छाप है । वे बड़ी श्रद्धालु थी । पूजापाठ किये बिना कभी भोजन न करती । हमेशा हवेली[२] जातीं। मुझे होश सँभालनेके बाद यह याद नहीं पड़ता कि उन्होंने कभी चातुर्मास न किया हो । वे कठिन से कठिन व्रत ले लेतीं और उन्हें निर्विघ्न पूरा करतीं । लिए हुए व्रतोंको बीमार पड़ने पर भी कभी न छोड़तीं। मुझे ऐसा एक अवसर याद है । उन्होंने चान्द्रायण व्रत लिया और उसी बीच बीमार पड़ गईं । किन्तु उन्होंने व्रत नहीं छोड़ा। चातुर्मासमें एकाशन तो उनके लिए सामान्य बात थी। दूसरे एक समय चातुर्मासमें उन्हें इतने से ही सन्तोष नहीं हुआ और उन्होंने उसे छोड़कर तीसरे दिन भोजन करनेका व्रत लिया था । लगातार दो-तीन दिन उपवास कर जाना उनके लिए साधारण बात थी । एक चातुर्मासमें उन्होंने यह व्रत लिया था कि सूर्यनारायणके दर्शन करके ही भोजन किया जाये । उस चौमासे में घरके हम बच्चे बादल ही ताकते रहते कि कब सूर्य दिखे और कब माँ भोजन करें। यह तो सभी जानते हैं कि कई बार बरसात में सूर्य-नारायणके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। मुझे उन दिनोंकी याद है, सूर्य दिखते ही हम पुकार उठते : "बा, बा, सूरज निकला; " और माँ जल्दी-जल्दी बाहर आतीं कि सूरज छुप जाता; और वे फिर कहतीं, "कोई बात नहीं, आज नसीब में भोजन नहीं है।" वे इतना कहकर लौट जातीं और काममें डूब जातीं ।
माता व्यवहार कुशल थीं। वे दरवारकी सारी बातें जानती थीं। रनिवासमें उनकी बुद्धिकी बड़ी कद्र थी। बालक होनेके कारण कभी-कभी मैं भी उनके साथ महल में चला जाता था । बा -- माँ साहब[३] के साथ जो बातें होतीं उनमें से कुछकी याद मुझे अभी तक है ।
इन माता-पिता के यहाँ संवत् १९२५ की भादों वदी बारस तदनुसार २ अक्तूबर,१८८९ को पोरबन्दर अथवा सुदामापुरीमें मेरा जन्म हुआ । मेरा बचपन पोरबन्दर में ही बीता। याद पड़ता है कि मैं किसी पाठशालामें भरती करा दिया गया था । वहाँ