आश्रमकी खादी के पहले थानकी लागत की गज सतरह आने आई । मैंने मित्रोंसे मोटी और कच्चे सूतकी खादीके दाम सतरह आना फी गजके हिसाब से लिये, जो उन्होंने खुशी-खुशी दिये ।
मैं बम्बई में रोग - शय्यापर पड़ा भी सबसे पूछता रहता था । वहाँ दो कातनेवाली बहनें मिलीं। उन्हें एक सेर सूतका एक रुपया दिया । मैं खादी शास्त्रमें अभी निपट अनाड़ी था। मुझे हाथकते सूतकी जरूरत थी । कत्तिनोंकी जरूरत थी । गंगाबहन जो भाव देती थीं, उससे तुलना करने पर मालूम हुआ कि मैं ठगा जा रहा हूँ । लेकिन वे बहनें कम लेनेको तैयार न थीं। अतएव उन्हें छोड़ देना पड़ा । पर उन्होंने अपना काम किया। उन्होंने श्री अवन्तिकाबाई, श्री रमीबाई कामदार, श्री शंकरलाल बैंकरकी माताजी और श्रीमती वसुमतीबनको[१] कातना सिखा दिया और मेरे कमरे में चरखा गूंजने लगा। यह कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि इस यन्त्रने मुझ बीमारको चंगा करने में मदद की। बेशक, यह असर मानसिक था । पर मनुष्यको स्वस्थ या अस्वस्थ करने में मनका हिस्सा कौन कम होता है ? मैंने भी चरखा हाथमें लिया । परन्तु मैं इस समय इससे आगे जा नहीं सका ।
बम्बई में हाथकी पूनियाँ कैसे प्राप्त की जायें ? श्री रेवाशंकर झवेरीके बंगलेके पाससे रोज एक धुनियाँ ताँत बजाता हुआ निकला करता था । मैंने उसे बुलाया । वह गद्दोंके लिए रुई धुना करता था । उसने पूनियाँ तैयार करके देना स्वीकार किया । भाव ऊँचा माँगा, जो मैंने दिया। इस तरह तैयार हुआ सूत मैंने ठाकुरजी की मालाके लिए दाम लेकर वैष्णवोंको बेचा। भाई शिवजीने बम्बई में चरखा सिखानेका वर्ग शुरू किया । इन प्रयोगों में पैसा काफी खर्च हुआ। श्रद्धालु देशभक्तोंने पैसे दिये और मैंने खर्च किये। मेरे नम्र विचारमें यह खर्च व्यर्थ नहीं गया । उससे बहुत कुछ सीखनेको मिला । चरखेकी मर्यादाका माप मिल गया ।
अब मैं केवल खादीमय बननेके लिए अधीर हो उठा। मेरी धोती देशी मिलके कपड़े की थी। बीजापुर में और आश्रम में जो खादी बनती थी, वह बहुत मोटी और ३० इंच अर्जकी होती थी। मैंने गंगाबहनको चेतावनी दी कि अगर वे एक महीनेके अन्दर ४५ इंच अर्जकी खादीकी धोती तैयार करके न देंगी, तो मुझे मोटी खादी की घुटनोंतक की धोती पहनकर अपना काम चलाना पड़ेगा। गंगाबहन अकुलाई । मुद्दत कम मालूम हुई, पर वे हारी नहीं। उन्होंने एक महीनेके अन्दर मेरे लिए ५० इंचका घोती-जोड़ा मुहैया कर दिया और मेरा दारिद्र्य दूर किया ।
इसी बीच भाई लक्ष्मीदास लाठी गाँवसे एक अन्त्यज भाई रामजी और उनकी पत्नी गंगाबहनको आश्रम में लाये और उनके द्वारा बड़े अर्जकी खादी बुनवाई । खादी-प्रचारमें इस दम्पतीका हिस्सा सामान्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने गुजरातमें और गुजरात के बाहर हाथका सूत बुनने की कला दूसरोंको सिखाई है। निरक्षर परन्तु संस्कारशील गंगाबहन जब करघा चलाती हैं, तब उसमें इतनी लीन हो जाती हैं कि
- ↑ १. ये वास्तवमें उड़ीसाके गोविन्द बाबू थे जिन्होंने इन बहनोंको कातना सिखाया था । देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ ४५१ ।
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