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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४०३

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

चाहिए कि हिन्दुस्तानकी आवश्यकताका सब माल हम उत्पन्न नहीं करते हैं । अतएव स्वदेशीका प्रश्न मुख्यतः उत्पादनका प्रश्न है । जब हम आवश्यक मात्रामें कपड़ा पैदा कर सकेंगे और कपड़ेकी किस्ममें सुधार कर सकेंगे, तब विदेशी कपड़ेका आना अपने- आप बन्द हो जायेगा । इसलिए आपको मेरी सलाह तो यह है कि आप अपना स्वदेशी आन्दोलन जिस तरह चला रहे हैं, उस तरह न चलायें और नई मिलें खोलनेकी ओर ध्यान दें । हमारे देश में स्वदेशी माल खपानेका आन्दोलन चलानेकी आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसे उत्पन्न करनेकी आवश्यकता है ।

मैने कहा, "यदि मैं यही काम कर रहा होऊँ, तब तो आप उसे आशीर्वाद देंगे न ?"

"सो किस तरह? यदि आप मिल खोलनेका प्रयत्न करते हों, तो आप धन्य- वादके पात्र हैं ।”

"ऐसा तो मैं नहीं कर रहा हूँ, पर मैं चरखेके काम में लगा हुआ हूँ ।"

"यह क्या चीज है ?" मैंने चरखेकी बात सुनाई मैंने चरखेकी बात सुनाई और कहा, "मैं आपके विचारोंसे सहमत हूँ । मुझे मिलोंकी दलाली नहीं करनी चाहिए। इससे फायदेके बदले नुकसान ही है। मिलोंका माल पड़ा नहीं रहता। मुझे तो उत्पादन बढ़ानेमें और उत्पन्न हुए कपड़े को खपाने में लगना चाहिए। इस समय मैं उत्पादनके काम में ही लगा हुआ हूँ । इस प्रकारकी स्वदेशीमें मेरा विश्वास है, क्योंकि उसके द्वारा हिन्दु- स्तानकी भूखों मरनेवाली अर्ध-बेकार स्त्रियोंको काम दिया जा सकता है। उनका काता हुआ सूत बनवाना और उसकी खादी लोगोंको पहनाना, यही मेरा विचार है और यही मेरा आन्दोलन है। मैं नहीं जानता कि चरखा आन्दोलन कहाँतक सफल होगा। अभी तो उसका आरम्भ-काल ही है । पर मुझे उसमें पूरा विश्वास है । कुछ भी हो, उसमें नुकसान तो है ही नहीं । हिन्दुस्तानमें उत्पन्न होनेवाले कपड़े में जितनी वृद्धि इस आन्दोलनसे होगा उतना फायदा ही है । अतएव इस प्रयत्नमें आप जो बताते हैं वह दोष तो है ही नहीं ।"

" यदि आप इस रीतिसे आन्दोलन चलाते हों, तो मुझे कुछ कहना नहीं है । हाँ, इस युगमें चरखा चल सकता है या नहीं, यह एक अलग बात है। मैं तो आपकी सफलता ही चाहता हूँ ।"

 

४२. असहयोगका प्रवाह

आगे चलकर खादीकी प्रगति किस प्रकार हुई, इसका वर्णन इन प्रकरणोंमें नहीं किया जा सकता। कौन-कौन-सी वस्तुएँ जनताके सामने किस प्रकार आईं, यह बता देनेके बाद उनके इतिहास में उतरना इन प्रकरणोंका क्षेत्र नहीं है । ऐसा करें तो उक्त विषयोंकी अलग पुस्तक ही तैयार हो सकती है । यहाँ तो मैं इतना ही बताना चाहता हूँ कि सत्यकी शोध करते हुए कुछ वस्तुएँ मेरे जीवनमें एकके बाद एक किस प्रकार अनायास आती चली गई ।