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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४०५

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

रह गया। मैंने प्रस्ताव तैयार करके रेलगाड़ी में ही मौलाना शौकतअलीको दे दिया । रात में मुझे ख्याल आया कि मुख्य शब्द 'शान्तिमय' तो छूट गया है। मैंने महादेव को दौड़ाया और कहलवाया कि छापते समय प्रस्ताव में 'शान्तिमय शब्द बढ़ा लें । मेरा कुछ ऐसा ख्याल है कि शब्द बढ़ानेसे पहले प्रस्ताव छप चुका था । विषय- विचारिणी समिति की बैठक उसी रात थी । अतएव उसमें उक्त शब्द मुझे बाद में बढ़वाना था। मैंने देखा कि यदि मेरे पास प्रस्तावका तैयार मसविदा न होता, तो बड़ी मुश्किलका सामना करना पड़ता ।

मेरी स्थिति दयनीय थी । मैं नहीं जानता था कि कौन प्रस्तावका विरोध करेगा और कौन प्रस्तावका समर्थन करेगा । लालाजीके रुखके विषय में मैं कुछ नहीं जानता था । कलकतेमें तपे-तपाये अनुभवी योद्धा उपस्थित हुए थे । विदुषो एनी बेसेंट, पं० मालवीयजी, श्री विजयराघवाचार्य, पं० मोतीलालजी, देशबन्धु आदि उनमें थे ।

मेरे प्रस्ताव में खिलाफत और पंजाबके अन्यायको ध्यान में रखकर ही असहयोगकी बात कही गई थी। श्री विजयराघवाचार्यको इसमें कोई दिलचस्पी मालूम न हुई । उन्होंने कहा: “यदि असहयोग ही करना है, तो वह अमुक अन्यायके लिए ही क्यों किया जाये ? स्वराज्यका अभाव बड़ेसे बड़ा अन्याय है । अतएव उसके लिए असहयोग किया जा सकता है।" मोतीलालजी भी स्वराज्यकी मांगको प्रस्तावमें दाखिल कराना चाहते थे। मैंने तुरन्त ही इस सूचनाको स्वीकार कर लिया और प्रस्तावमें स्वराज्यकी माँग भी सम्मिलित कर ली। विस्तृत, गम्भीर और कुछ तीखी चर्चाओंके बाद असहयोगका प्रस्ताव पास हुआ ।[]

मोतीलालजी उसमें सबसे पहले सम्मिलित हुए। मेरे साथ हुई उनकी मीठी चर्चा मुझे अभीतक याद है । उन्होंने कुछ शाब्दिक परिवर्तन सुझाये थे, जिन्हें मैंने स्वीकार कर लिया था । देशबन्धुको मना लेनेका बीड़ा उन्होंने उठाया था । देशबन्धुका हृदय असहयोगके साथ था, पर उनकी बुद्धि उनसे कह रही थी कि असहयोगको जनता ग्रहण नहीं करेगी । देशबन्धु और लालाजीने असहयोगके प्रस्तावको पूरी तरह तो नागपुर में स्वीकार किया ।

इस विशेष अधिवेशन के अवसरपर लोकमान्यकी अनुपस्थिति मेरे लिए बहुत दुःखदायक सिद्ध हुई। आज भी मेरा मत है कि वे जीवित होते, तो कलकत्तेकी घटनाका स्वागत करते । पर वैसा न होता और वे विरोध करते, तो भी मुझे वह अच्छा ही लगता । मुझे उससे कुछ सीखनेको मिलता । उनके साथ मेरे मतभेद सदा ही रहे, पर वे सब मीठे थे। उन्होंने मुझे हमेशा यह माननेका मौका दिया था कि हमारे बीच निकटका सम्बन्ध है । यह लिखते समय उनके स्वर्गवासकी बात मेरे सामने खड़ी है। मेरे साथी पटवर्धनने आधी रातको मुझे टेलीफोनपर उनके अव-

सानका समाचार दिया था । उसी समय मैंने साथियोंसे कहा था : “मेरे पास एक बड़ा सहारा था, जो आज टूट गया।"[]उस समय असहयोगका आन्दोलन पूरे

  1. १. असहयोग प्रस्ताव पर गांधीजीके भाषणोंके लिए देखिए खण्ड १८, पृष्ठ २६९-७६ ।
  2. २. लोकमान्यको गांधीजीकी श्रद्धांजलिके लिए देखिए खण्ड १८, पृष्ठ ११९ ।