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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४०७

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सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा

द्वारा ही हमें स्वराज्य प्राप्त करना चाहिए। इस शर्तका भी विरोध किया गया था । पर कांग्रेसने उसे अस्वीकार किया और सारा विधान काँग्रेसमें सुन्दर चर्चा होनेके बाद स्वीकृत हुआ । मेरा मत है कि यदि लोगोंने इस विधानपर प्रामाणिकता पूर्वक और उत्साह पूर्वक अमल किया होता, तो उससे जनताको बड़ी शिक्षा मिलती । उसके अमलमें स्वराज्य की सिद्धि निहित थी। पर यह विषय यहाँ प्रस्तुत नहीं है ।

इसी सभा में हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारेमें, अस्पृश्यता निवारणके बारेमें और खादीके बारेमें भी प्रस्ताव पास हुए। उस समयसे कांग्रेसके हिन्दू सदस्योंने अस्पृश्यताको मिटानेका भार अपने ऊपर लिया है और खादीके द्वारा कांग्रेसने खिलाफतके सवालके सिलसिले में असहयोगका निश्चय करके हिन्दू-मुस्लिम एकता सिद्ध करनेका एक महान प्रयास किया था ।

पूर्णाहुति

अब इन प्रकरणों को समाप्त करनेका समय आ पहुँचा है ।[]

इससे आगेका मेरा जीवन इतना अधिक सार्वजनिक हो गया है कि शायद ही कोई चीज ऐसी हो, जिसे जनता जानती न हो। फिर सन् १९२१ से मैं कांग्रेसके नेताओंके साथ इतना अधिक ओतप्रोत होकर रहा हूँ कि मैं किसी प्रसंगका वर्णन नेताओंके सम्बन्धकी चर्चा किये बिना, यथार्थ रूपमें कर ही नहीं सकता । ये सम्बन्ध अभी ताजे हैं। श्रद्धानन्दजी, देशबन्धु, लालाजी और हकीम साहब आज हमारे बीच नहीं हैं। पर सौभाग्यसे दूसरे कई नेता अभी मौजूद हैं। कांग्रेसके महान परिवर्तनके बादका इतिहास अभी तैयार हो रहा है । मेरे मुख्य प्रयोग कांग्रेसके माध्यम से हुए हैं । अतएव उन प्रयोगोंके वर्णनमें नेताओंके सम्बन्धोंकी चर्चा अनिवार्य है । शिष्टताके विचारसे भी फिलहाल तो मैं ऐसा कर ही नहीं सकता। अन्तिम बात यह है कि इस समय चल रहे प्रयोगोंके बारेमें मेरे निर्णय निश्चयात्मक नहीं माने जा सकते । अतएव इन प्रकरणोंको सम्प्रति तो बन्द कर देना ही मुझे अपना कर्त्तव्य मालूम होता है । यह कहना गलत न होगा कि इसके आगे खुद मेरी कलम ही चलनेसे इनकार करती है।

पाठकोंसे विदा लेते हुए मुझे दुःख होता है । मेरे निकट अपने इन प्रयोगोंकी बड़ी कीमत है । मैं नहीं जानता कि मैं उनका यथार्थ वर्णन कर सका हूँ या नहीं । यथार्थ वर्णन करनेमें मैंने कोई कसर नहीं रखी है। सत्यको मैंने जिस रूपमें देखा है, जिस मार्ग से देखा है, उसे उसी तरह प्रकट करनेका मैंने सतत प्रयत्न किया है, और पाठकोंके लिए उसका वर्णन करके चित्तमें शान्तिका अनुभव किया है, क्योंकि मैंने आशा यह रखी है कि इससे पाठकोंमें सत्य और अहिंसाके प्रति अधिक आस्था

उत्पन्न होगी ।

  1. १. २९-११-१९२८ का श्री सी० एक० एन्ड्यूजके नाम पत्रमें भी गांधीजीने इसका उल्लेख किया है। देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ १३० ।