परन्तु हम तो रोज पढ़ते हैं कि जन्म-मरण दोनों एक ही चीजके दो पहलू हैं । जो जन्म लेता है वह मरता है, जो मरता है वह जन्म लेता है । इस कोल्हूमें से कोई-कोई बिलकुल निकल भी जाते हैं । मगर जो निकलते हैं और जो नहीं निकलते, उन दोनोंके जन्म-मरणसे हर्ष-शोक होनेका कारण बिलकुल नहीं है। यह जानता हूँ इसलिए मैं निश्चिन्त होकर घूमता रहता हूँ । रसिक तो अब 'रामायण' का पुजारी हो गया है, इसलिए ऐसी प्रतीति होती है कि उसकी आत्मा शान्त ही है ।
मैं चाहता हूँ कि सब बहनें रसोईघर और बाल-मन्दिरको ज्यादा सुशोभित करें। बच्चों में मसाले खानेका लोभ मत उपजने देना । तुम भविष्य में देखोगी कि इससे बच्चोंको लाभ ही होता है। अब तो तुमने देख लिया होगा कि मसालेके बिना आम तौर पर शरीर बिगड़ता नहीं है । कुछ लोगोंमें उसकी आदत घर कर गई हो और वे न छोड़ सकें, तो यह बात बिलकुल अलग है । इस बातपर विचार करना। बच्चोंका शोर बन्द करना तो तुम्हारे ही हाथमें है । तुम्हें गंगाबहनका बोझा हलका करना चाहिए। उनसे दूसरा काम भी लिया जा सकता है। घंटोंको बाँटकर अमुक समयके लिए तो तुम्हें गंगाबह्नको रसोईघरमें आने ही नहीं देना चाहिए ।
छारोड़ी के[१] सिवा कहींसे भी घी मँगवानेका विचार छोड़ देना चाहिए। वहाँका घी न मिले, तब फिर उसके बिना काम चलानेकी आदत डाल लेनी चाहिए । अव तो यह साबित हो गया माना जा सकता है कि अलसीके तेलसे जरा भी नुकसान नहीं होता। दूध-दही मिले तो घी न मिलनेपर चिन्ताका कारण ही नहीं है ।
सागकी मर्यादा बाँध ही लेना । साफ किया हुआ कोई भी साग एक बारमें फी आदमी दस तोलेसे ज्यादा हरगिज न बनाया जाये, यह नियम बना लेना आवश्यक है ।
इन परिवर्तनोंमें तुम्हारे मानसिक सहयोगकी जरूरत है। यानी तुम्हें इन्हें हृदय और मनसे स्वीकार कर लेना चाहिए ।
बाल-मन्दिरके लिए तुम्हें तैयार होना है । वह तैयारी अब तुम जी भरकर कर सकती हो, क्योंकि तुम्हारे लिए ही एक शिक्षक नियुक्त है और वह कुशल है ।
मैं १५ तारीखके बजाय १६की रातको वहाँ पहुँचूँगा । यहाँ देरसे आया इस कारण एक दिन टूट गया ।
बापूके आशीर्वाद
- [ गुजरातीसे ]
- बापूना पत्रो - १ : आश्रमनी बहनोने
- ↑ १. आश्रमके पास एक गाँव ।