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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४१४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

क्या मैंने तुम्हें यह खबर दी थी कि उ० मं० में पिछले सप्ताह इतनी ठंड पड़ी कि बाल्टियों और छोटे हौजका पानी जम गया था ? थर्मामीटरमें तापमान २८ डिग्री तक नीचे आ गया था, जो साबरमती में पहले कभी नहीं सुना गया। हमारे यहाँ तरकारियों और कपास वगैराकी बहुत बढ़िया फसल थी । बेचारे सोमाभाईने इस काम में अपनी जान लड़ा दी थी। खैर, इस भयंकर पालेसे लगभग सब-कुछ बरबाद हो गया, यहाँतक कि पपीतेका सुन्दर बगीचा भी नष्ट हो गया। सारा खेत रोता-सा नजर आता है । उसकी ओर देखा नहीं जाता। फिर भी इस विपत्तिके पीछे प्रकृतिका कोई शुभ हेतु है, जिसे हम समझ तो नहीं सकते परन्तु उसपर हमारी पूर्ण आस्था है । और हमारे हृदयमें आस्थाका होना ही अदृष्ट और अदृश्य वस्तुओंका प्रमाण है ।

मुझे आशा है कि अब तुम्हारी तन्दुरुस्ती पूरी तरह सुधर गई होगी । तुम अपने शरीरकी मर्यादाओंको समझो - क्या नहीं समझोगी - और एक संन्यासीका जिस प्रकार यह धर्म है कि वह अपने सुरक्षित व्यक्तिकी सुख-सुविधाकी व्यवस्था करे उसी प्रकार तुम भी जो चीजें तुम्हारे शारीरिक स्वास्थ्यके लिए जरूरी हों उन्हें आग्रहपूर्वक ले लिया करो । अवश्य ही तुम शरीरको लाड़-प्यार न दो, पर उसे अपने विकासके लिए ईश्वरकी तरफसे मिली हुई थाती समझो और तब उसकी बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी करना उचित ही नहीं, बल्कि तुम्हारा फर्ज होगा ।

कार्यक्रमकी सभी तिथियाँ दो दिन आगे बढ़ा देनेसे ही काम नहीं चलेगा । उसका क्रम भी बदल दिया गया है और हैदराबाद सिन्धको प्रधान कार्यालय मानना ज्यादा ठीक रहेगा । मैंने तार भेजनेपर खर्च नहीं किया क्योंकि तुम्हारे भेजे हुए पत्र तो मुझे मिल ही जायेंगे ।

सस्नेह,

बापू

[ पुनश्च : ]

हाँ, तुमने यूरोप यात्राके बारेमें मेरे लेख[] पढ़े होंगे। क्या तुम सहमत नहीं हो ? रोलाँको लिखना ।

बापू

अंग्रेजी (जी० एन० ९३९५) से तथा (सी० डब्ल्यू० ५३४० ) से भी ।
सौजन्य : मीराबहन
 
  1. १. देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ ४४६ ।