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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४१७

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१०. भाषण : भारत सरस्वती मन्दिर, कराची में[]

५ फरवरी १९२९

गांधीजीने राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओंके बने रहनेका औचित्य बताते हुए छोटाकिन्तु जोरदार भाषण दिया। उन्होंने कहा, राष्ट्रीय शालाएँ असहयोग आन्दोलनका एक अत्यन्त महत्वपूर्ण फल हैं। उनकी संख्या घट गई है, यह दुर्भाग्यकी बात है; इससे माता-पिताओंकी उदासीनता प्रकट होती है। जो संस्थाएँ देशके निराशाजनक राजनीतिक वातावरणके बावजूद अब भी कायम हैं वे मरुभूमिमें नखलिस्तानोंकी तरह हैं और मुझे विश्वास है कि उस भयंकर संकटकी घड़ी में ये शालाएँ राष्ट्रके आवाहन का उत्तर देंगी जिस समय कि महलों सरीख स्कूलों और कालेजोंके छज्जे सैनिकोंकी बारकें बनी हुई होंगी जहाँसे वे स्वतन्त्रताको लड़ाई लड़नेवालोंको गोलियोंसे भून रहे होंगे। बारडोलोके सरदार जो विलक्षण कार्य करके दिखा सके वह उन स्वयंसेवकों के बल पर ही जो गुजरातकी राष्ट्रीय शालाओंसे सीधे प्राप्त हुए थे, अथवा जो उस सेवा-भावनाके वातावरणकी उपज थे जो इन राष्ट्रीय शालाओंने अपने चारों ओर उसी प्रकार फैला दिया था जिस प्रकार कि एक पुष्पोद्यान अपने चारों ओरके वातावरणको सुवासित कर देता है। राष्ट्रीय शालाओं द्वारा उत्पन्न यही वातावरण था जिसने १९२७ की असाधारण बाढ़के बाद गुजरातमें पैदा होनेवाले संकटके दौरान वल्लभभाईको दृढ़ और कठिन परिश्रमी स्वयंसेवकोंकी वह फौज प्रदान की थी जिसकी सहायता से सरदार इस संकट से गुजरातको उस समय उबार सके, जब कि सरकारी तन्त्र लोगोंको सहायता पहुँचाने में बिल्कुल असमर्थ सिद्ध हो चका था ।

[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, १४-२-१९२९
 
  1. १. यह अंश प्यारेलाल द्वारा लिखित गांधीजीकी सिन्ध यात्राके विवरणसे लिया गया है।
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