१३. भाषण : सिखोंकी सभा, कराचीमें[१]
५ फरवरी १९२९
गांधीजीने श्रोताओं सिखों को बताया कि न तो मुसलमानों और न हिन्दुओंका ही ऐसा कोई इरादा है कि वे अपना अनन्य शासन स्थापित करें। कुछ व्यक्तियोंके भाव गोंसे आपको यह नहीं मान बैठना चाहिए कि ऐसे लोग सारे हिन्दू-समाज या सारे मुसलमान समाजकी राय व्यक्त कर रहे हैं, और सबसे बड़ी बात तो आपको यह नहीं भूलनी चाहिए कि अगर कोई एक सम्प्रदाय ऐसी कुटिल इच्छा रखता भी हो तो उसको निराशा ही हाथ लगेगी। अगर एक जाति पर किसी दूसरी जातिका शासन होना ही है, तब तो अंग्रेज लोग हैं ही जिनके पास इतने साधन और इतनी शक्ति है कि वे अपना शासन सुरक्षित रख सकें। वर्तमान परिस्थितियोंमें दो ही बातें सम्भव हैं: एक तो यह कि जिन विभिन्न वर्गोंसे मिलकर भारत राष्ट्र बना है, उन सभी वर्गोंके सम्मिलित प्रयास से मौजूदा (ब्रिटिश) शासनका अन्त और स्वराज्यकी स्थापना हो; या दूसरी यह कि हमारी मौजूदा गुलामी चिरस्थायी हो जाये। गांधीजीने कहा- यह सही नहीं है कि कांग्रेस अथवा नेहरू- रिपोर्टने सिखोंके दावोंकी उपेक्षा की है। उन्होंने उनको याद दिलाया कि नेहरू रिपोर्टमें जो सिफारिशें की गई हैं वे सिख-प्रतिनिधियोंकी सहमति से ही की गई हैं, और फिर सर्वदलीय परिषदका समापन जीकरनेके बजाय उसे स्थगित हो इसलिए किया गया है ताकि अन्य चीजोंके अलावा,उसमें सिखोंके प्रतिनिधित्व के सवालपर भी विचार किया जा सके । औपनिवेशिक स्वराज्य के बारेमें की गई शिकायत के सिलसिले में गांधीजीने अपनी सर्वविदित राय पुनःदोहराई और सिखोंसे अनुरोध किया कि वे धीरज रखें और कांग्रेसमें, और इस प्रकार अपने आपमें विश्वास न खोयें। क्योंकि, उन्होंने कहा, कांग्रेसका रूप वही तो हो सकता है जो सब लोग मिल कर उसे देंगे। राष्ट्रकी इच्छासे अलग कांग्रेसका कोई अस्तित्व नहीं है ।
- [ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, १४-२-१९२९
- ↑ १. यह अंश प्यारेलाल द्वारा लिखित गांधीजीकी सिन्ध-यात्राके वर्णनसे लिया गया है।