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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४२१

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भाषण : डी० जे० एस० कालेज हॉल, कराची में

तो जैसे मुझसे कहा है : "हाँ, हम जानते हैं कि आपको क्या पसन्द है, लेकिन, हम आपको वही चीज देंगे जो आपको पसन्द नहीं है ।" यह तो बिलकुल लोमड़ी और सारसकी कहानीवाली बात हुई। आप जानते हैं कि किस प्रकार दोनोंने एक दूसरेको खाने पर बुलाया और फिर भूखा रखा। आपने मुझे यहाँ इसी प्रकार बुलाया है । आपने मुझे संसारका सबसे महान व्यक्ति कहा है, लेकिन आप शिष्टताकी पहली आवश्यक शर्त भूल गये, जो यह थी कि आप मुझसे मातृभाषामें बोलें । अथवा क्या ऐसा था कि मुझे महात्मापनकी हिमालय जैसी ऊँची हिमाच्छादित ऊँचाई तक उठाकर और अपने आचरण द्वारा मेरा अनुकरण करनेके कर्त्तव्यसे खुदको मुक्त करके आप मेरा मजाक बनाना चाहते थे ? मैं मुस्करा रहा हूँ, इससे आप ऐसा न समझें कि मैं दिलमें खुश हूँ । सच कहूँ, तो मैं दिल ही दिलमें रो रहा हूँ । आपको विदेशी कपड़े पहने देखकर मुझे मार्मिक पीड़ा हो रही है । मुझे यह बहुत ही अजीब बात लग रही है। नेहरू रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि स्वराज्यके अन्तर्गत हिन्दुस्तानी राष्ट्र- भाषा और सरकारी भाषा होगी। लेकिन आप इसपर शायद जवाब देंगे, "ओह, ये सब पुराने विचार हैं जो दकियानूस बुड्ढोंको माफिक आते हैं; हम उनका अनु- करण करने नहीं जा रहे हैं। हम लोग तो 'इंडिपेंडेंसवाले' हैं ।" लेकिन तब मैं आपको जनरल बोथाके उदाहरणकी याद दिलाऊँगा, जिन्होंने बोअर युद्धके बाद दक्षिण आफ्रिकी वार्त्ताके समय ब्रिटिश सम्राट तकके सामने अंग्रेजीमें बोलनेसे इनकार कर दिया था और एक दुभाषिएकी मदद लेकर खुद डच भाषामें ही बोलना पसन्द किया था । स्वतन्त्रता-प्रेमी लोगोंका प्रतिनिधि यही तो कर सकता था । आप अपनी इन गरीब बहनोंके पवित्र हाथोंसे तैयार की हुई हाथकती खादी पहननेसे इनकार करने का साहस कैसे कर सकते हैं? आपने मुझे खद्दरकी माला पहनाई है; तब फिर आप स्वयं विदेशी कपड़ेके बने कालर पहननेका साहस कैसे करते हैं ? अगर कालर पहनना जरूरी ही हो तो आप विठ्ठलदास जेराजाणी द्वारा तैयार किये खदरके कालर क्यों नहीं पहन सकते ? ये दिखावटी विदेशी चीजें सजावट नहीं, बल्कि ये आपकी पैरों में पड़ी बेड़ियाँ हैं। क्योंकि इनके कारण प्रतिवर्ष ६९ करोड़ रुपया भारतसे बाहर चला जाता है और इससे भारतको गुलामीको स्थितिमें रखने में मदद मिलती है । इसीलिए मैं चिल्ला-चिल्ला कर कहता हूँ : “ लड़को और लड़कियो, देखो, तुम लोग दिखावटकी वस्तुओंपर कितना धन बरबाद कर रहे हो; अपने देशवासियोंकी याद करो जो भूखके कारण मर रहे हैं । तुम्हें एक दिन ईश्वरके न्यायासनके सामने जाकर इस दारुण प्रश्नका उत्तर देना होगा कि "तुमने अपने भाईके साथ क्या बरताव किया ? " हमारे जनसाधारणकी स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है । यहाँतक कि हमारा व्यापार भी हमारे शोषणका एक साधन बना लिया गया है । सामान्यतः व्यापारकी तरक्कीके साथ-साथ समृद्धि भी बढ़ती है, लेकिन भारतमें स्थिति इसके ठीक विपरीत है । हमारा विदेशी व्यापार राष्ट्रीय समृद्धिको बढ़ानेके बजाय हमारे करोड़ों कारीगरोंके मुंहकी रोटी छीननेका साधन बन गया है । निःसन्देह आपका कराची, जो भारतका प्रवेश-द्वार है, बम्बई, मद्रास और कलकत्ताकी तरह