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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४२९

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अमानुषिक प्रणाली

होती रही हैं, मानो परम्परा बुराईको भी अच्छाईमें बदल देती हो । जाँच- कमेटीमें दो साहब थे, जिनमें एक तो स्वदेश लौटनेवाले प्रवासियोंके 'संरक्षक' कहे जाते हैं और दूसरे कलेक्टर हैं और ये दोनों ही अपने पेशेके कारण स्वभावसे ऐसी घटनाओंके आदी बन गये हैं। मैं तो इन जहाजोंको भी जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि किस तरह 'निर्वासित' कुली इन जहाजोंपर 'सारडाइन मछलियोंकी तरह एक जगह ठसाठस भर दिये जाते हैं,' (यह उक्ति मेरे अपने दिमागकी उपज नहीं है, इसके जन्मदाता तो वे ही लोग हैं जो कुलियोंको विदेश ले जानेका काम करते हैं) और सो भी ऐसे दरवों में जहाँ न तो हवाका पता होता है और न सूर्यकी रोशनीका ही । इसपर हमारे लोगोंकी थोड़ी-सी सर्दीके पड़ते ही धूप और हवासे बचनेकी आदत का ख्याल कीजिए। इस आदतसे उन्हें तब ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचता जब लाचार होकर वे लगभग सारे दिन घरके बाहर रहकर काम करते हैं। लेकिन इसका असर उनपर उस समय तो बहुत ही घातक होता है जब एस० एस० ' सतलज' जैसे जहाज के बन्द कैदखाने जैसे कमरोंमें उन्हें करीब-करीब अपनी सारी मुसाफिरी तय करनी पड़ती है ।

मेरी राय में इम्पीरियल इंडियन सिटिजनशिप एसोसिएशनको चाहिए कि वह इस तथाकथित जाँचपर ही सन्तोष न कर बैठे, बल्कि अब चूंकि वह इस भयंकर मृत्युसंख्याकी ओर जनताका ध्यान खींच चुका है इसलिए उसे निष्पक्ष खुली जाँच करवाने की माँग करनी चाहिए और इस जाँच में विशेषज्ञों द्वारा कुलियोंको विदेश ले जानेवाले जहाजोंकी बनावटकी भी जाँच करवानी चाहिए। इससे पता चलेगा कि इन दुःखद घटनाओंमें, जिनके बारेमें स्वीकार किया जा चुका है कि वे पहलेसे बराबर होती रही हैं, अनेक विभागों का हाथ था। साथ ही, इस जाँचसे यह भी मालूम होगा कि इस तरहकी मौतोंके लिए इन जहाजोंके मालिकोंका लोभ जितना जिम्मेदार है उतनी ही जिम्मेदारी है इनके कप्तानों और अधिकारियों द्वारा प्रवासी कुलियोंके प्रति बरती जानेवाली घोर निर्मम उपेक्षाकी, क्योंकि वे लोग प्रवासी भारतीय कुलियोंको अपने समान ही मनुष्य समझकर उनके साथ मनुष्यताका बर्ताव नहीं करते बल्कि उन्हें पशु समझते और वैसा ही व्यवहार करते हैं। सच पूछा जाये तो जहाजोंमें इनकी अपेक्षा पशुओंकी ज्यादा देख-भाल की जाती है, क्योंकि अगर उनकी अच्छी तरह देख- भाल न जायेगी तो उनके मालिक हर्जाना वसूल करेंगे ।

[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, ७-२-१९२९