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२०. 'युद्धके प्रति मेरा दृष्टिकोण
उक्त शीर्षकके अन्तर्गत १३ सितम्बर, १९२८ के 'यंग इंडिया' में प्रकाशित मेरे लेखको[१] लेकर मेरे पास बहुतसे पत्र आये हैं और यूरोपके जो अखबार युद्धके विरुद्ध युद्ध छेड़नेके पक्षमें हैं उनमें भी बहुत-से पत्र छपे हैं। मुझे व्यक्तिगत रूपसे लिखे गये पत्रोंमें से एक पत्र टॉल्स्टॉयके मित्र और अनुयायी, वो० चरकॉफका है। चूँकि इस पत्रके लेखकका शान्ति-प्रेमी लोगोंमें अत्यन्त आदरपूर्ण स्थान है, अतः पाठक उनके पत्रको पढ़ना चाहेंगे । वह इस प्रकार है :[२]
- आपके रूसी मित्र आपको अपना हार्दिक अभिनन्दन भेजते हैं और ईश्वर तथा मानव-जातिके लिए आपकी अनवरत सेवाओंकी अधिकाधिक सफलताकीकामना करते हैं। हम आपके जीवन, आपके विचारों और आपके कार्योंको बड़ी दिलचस्पी के साथ देखते रहते हैं और आपकी हर सफलतापर हर्ष मनाते हैं। हम महसूस करते हैं कि अपने देशमें आपको जो उपलब्धि होती है वह साथ ही साथ हमारी उपलब्धि भी है, क्योंकि हमारी परिस्थितियाँ यद्यपि भिन्न हैं, तथापि हम दोनों एक ही उद्देश्यके लिए कार्य कर रहे हैं । आपने अपनी उपस्थितिसे, अपने जीवन के उदाहरण द्वारा और अपने फलदायी सामाजिक कार्यों द्वारा जो कुछ दिया है और दे रहे हैं, उसके लिए हम आपके प्रति कृतज्ञता अनुभव करते हैं। हम आपके साथ अत्यन्त गहरी और आनन्ददायी एकताका अनुभव करते हैं ।
- इस वर्ष 'यंग इंडिया' के १३ सितम्बर के अंकमें 'युद्धके प्रति मेरा
दृष्टिकोण' शीर्षकके अन्तर्गत प्रकाशित आपका लेख देखकर आपके अनेक प्रशंसकों और मित्रोंको दुःख पहुँचा है। और मैं इस विषयपर अपनी भावनाओं तथा अपने विचारोंको व्यक्त करना आवश्यक समझता हूँ ।
- ब्रिटिश सरकार द्वारा छेड़ी गई पिछली तीन लड़ाइयोंमें आपने जो भाग लिया है उसे आप उचित बताते हैं । इसी विषयको लेकर कुछ वर्ष पहले अपने एक लेखमें, अगर मुझे ठीक याद है तो, आपने कुछ दूसरी ही बात कही थी। उस समय आपने अपने कामको उचित नहीं ठहराया था बल्कि आपने तो पहले ही असंगतिको भी स्वीकार किया था । और मुझे याद है कि अपनी पिछली भूलको जिस तत्परतासे आपने स्वीकार किया था उससे मैं और यहाँ आपके अन्य मित्र बहुत प्रभावित हुए थे और हमें बड़ी सान्त्वना