दूसरी बात यह कि में जिस प्रकारका जीवन जी रहा हूँ यदि उसका मौजूदा तौर-तरीका बनाये रखनेके लिए मुझे युद्धमें राज्यकी सहायता करनी पड़े, तो मुझे जीवनका अपना वह तौर-तरीका हर कीमतपर छोड़ देना चाहिए,भले ही ऐसा करनेमें मुझे अपने प्राणोंका उत्सर्ग करना पड़े, किन्तु मुझे किसी भी प्रकार अपने भाइयोंकी हत्या करनेमें लोगोंकी मदद नहीं करनी चाहिए । इसके अलावा यह भी बिलकुल सम्भव है कि हम हिंसाके प्रयोगके बिना हासिल की जा सकनेवाली सुविधाएँ सरकारसे हासिल करें, उनका उपयोग करें, लेकिन साथ ही सरकारके कुकृत्योंका कोई समर्थन न करें ।
शायद, यह गलतफहमी कुछ इस कारण भी पैदा होती है कि आपने हिंसा और हत्या के बीच कोई सुनिश्चित रेखा नहीं खींची। ऐसे भी मामले होते हैं जब बहुत सावधानीसे विचार किये बिना वास्तवमें यह स्पष्ट बताना कठिन होगा कि निश्चित रूपसे हिंसा की जा रही है अथवा नहीं। लेकिन युद्धके मामले में तो सन्देहकी कोई गुंजाइश ही नहीं है कि इसका आधार मनुष्यकी हत्या करना है। इसपर शायद हम दोनों सहमत हैं ।
मुझे श्री चैरकॉफको यह विश्वास दिलाने की जरूरत नहीं कि मैं न केवल उनके इस पत्रका बुरा नहीं मानता बल्कि उनकी हार्दिकताके लिए और खरी ईमानदारीके लिए उसका स्वागत करता हूँ ।
इस पत्र में उठाये गये मुद्दोंका बहुत विस्तारसे उत्तर देनेका मेरा विचार नहीं है । मैं ऐसा मानता हूँ कि इस विषयपर एक सीमासे आगे बहसकी गुंजाइश नहीं है । यह तो इस गहरे विश्वासका मामला है कि युद्ध विशुद्ध रूपसे एक बुराई है । युद्धसे घृणा करने में मैं किसीसे पीछे नहीं हूँ । लेकिन गहरा विश्वास एक चीज है और सही आचरण दूसरी चीज । एक युद्ध-विरोधी अपने ध्येयके हितमें जो कुछ करता है, मुमकिन है कि दूसरा युद्ध-विरोधी उसे पसन्द न करे और वह कोई ठीक उलटी चीज करे, फिर भी युद्धके सम्बन्धमें दोनोंका विचार एक ही हो। यह विरोधाभास मनुष्य-स्वभावकी चकरा देनेवाली जटिलताके कारण उत्पन्न होता है । इसलिए मैं इतना ही कह सकता हूँ कि एक ही सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवालोंको भी परस्पर सहिष्णुता बरतनी चाहिए।
अब मैं पत्रमें उठाये गये कुछ मुद्दोंको लेता हूँ । मुझे अपना लिखा या कहा गया ऐसा कुछ याद नहीं आता जिसमें मैंने ब्रिटेन द्वारा चलाये गये युद्धों में भाग लेनेपर पश्चात्ताप प्रकट किया हो। मैंने शायद इतना ही कहा होगा कि मुझे दुःख है कि मैंने ब्रिटेनकी सहायता की, क्योंकि यह बात मुझे बादमें स्पष्ट हुई कि ब्रिटेनकी नीति भारतके लिए अहितकर और मानवताके लिए खतरनाक थी । यदि मुझे युद्धके रूपमें उन तीनों युद्धों में भाग लेनेपर पश्चात्तापका अनुभव हुआ होता, तो मुझे उसकी याद रहती और मैं उसे बार-बार व्यक्त करता रहता- हाँ, इस बीच उन युद्धों में अपने भाग लेनेके बारेमें मेरी राय ही बदल गई होती तो दूसरी बात थी ।