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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४३३

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'युद्धके प्रति मेरा दृष्टिकोण'

कार्य-साधकता शब्दका हम जो अर्थ समझते हैं, उसके विचारसे मैंने कोई काम नहीं किया। मैंने अपने किये जिन कार्योंका विवरण दिया है, वे सभी शान्तिके पक्षको दृढ़ बनानेके उद्देश्यसे किये गये थे, ऐसा मेरा दावा है। इसका यह मतलब नहीं कि उन कार्योंसे शान्तिका पक्ष सचमुच मजबूत हो ही गया । मैं तो केवल यह तथ्य रख रहा हूँ कि मेरा अपना मंशा शान्तिको बल पहुँचाना था ।

हाँ, यह सम्भावना अवश्य है कि उस समय मैं मानसिक तौर पर इतना दुर्बल या अस्थिर रहा हूं और आज भी इतना दुर्बल या अस्थिर हूँ कि अपनी भूलको ठीक उसी प्रकार न देख पाया हूं जैसे एक अन्धा व्यक्ति वह नहीं देख सकता जो उसके पड़ोसियोंको दिखाई पड़ता है । मैं रोज देखता हूँ कि हम आत्म-प्रवंचनामें अत्यन्त ही सक्षम हैं। लेकिन फिलहाल मुझे किसी आत्म-प्रवचनाकी प्रतीति नहीं है । मैं तो यही अनुभव करता हूँ कि जिस माध्यम से शान्तिको देख रहा हूँ उससे मेरे यूरोपीय मित्र सर्वथा अपरिचित हैं । मैं एक ऐसे देशका वासी हूँ जिसे बलात् निरस्त्र कर दिया गया है और जिसे सदियोंसे दासतामें रखा गया है । इसलिए शान्तिके बारेमें मेरा दृष्टिकोण आवश्यक रूपसे यूरोपीय मित्रोंसे भिन्न होगा ही ।

मैं एक दृष्टान्त लेता हूँ । मान लीजिए कि बिल्लियाँ और चूहे हृदयसे शान्तिकी इच्छा करते हैं । तब बिल्लियोंको चूहोंके विरुद्ध युद्ध छोड़ना पड़ेगा। लेकिन चूहे किस प्रकार शान्तिको बढ़ावा देंगे ? वे क्या चीज छोड़ेंगे ? उनका मत लेना आवश्यक भी है ? और मान लीजिए कि बिल्लियाँ उस समझौतेको नहीं मानती जिसे बिल्लियोंकी सभामें तय किया गया हो और चूहोंका शिकार करती रहती हैं, तो चूहे क्या करेंगे ? मुमकिन है उनमें कुछ ऐसे बुद्धिमान चूहे भी हों और वे कहें: "हम तबतक स्वेच्छापूर्वक अपनी बलि देते रहेंगे जबतक बिल्लियाँ पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं हो जातीं और शिकार करनेमें उनको रस मिलना बन्द नहीं हो जाता । " चूहे अपने सिद्धान्तका प्रचार खूब करें, लेकिन शान्ति-प्रेमी होनेके नाते उन चूहोंके प्रति इनका क्या रवैया होना चाहिए जो अपने अत्याचारियोंके सामनेसे भागने के बजाय यह फैसला करते हैं कि वे शस्त्रास्त्रोंसे लैस होकर शत्रुओंका मुकाबिला करेंगे ? उनका यह प्रयास व्यर्थ हो सकता है, लेकिन जिन बुद्धिमान चूहोंकी मैंने कल्पना की है मुझे भय है कि वे कर्त्तव्यबद्ध होंगे कि अपना शान्तिका रवैया बरकरार रखते हुए भी अन्य चूहों को साहसी और शक्तिशाली बननेमें सहायता दें। वे नीतिवश ऐसा नहीं करेंगे, बल्कि इसके पीछे उनका नेकसे-नेक मंशा होगा । मेरा रवैया बिलकुल यही है । चूंकि हम लोग दुर्बल हैं इसलिए अहिंसाको समझना हमारे लिए आसान नहीं है, उसपर आचरण करना तो और भी कम आसान है । हम सबको प्रार्थनामय भावसे और विनम्रतापूर्वक काम करना चाहिए और ईश्वरसे बराबर प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें विवेकदृष्टि दे; और हमें प्रतिदिन ईश्वरीय प्रेरणा और समझके अनुसार आचरण करने को सदैव तत्पर रहना चाहिए । शान्तिके एक प्रेमी और समर्थकके नाते आज मेरा कर्त्तव्य यही है कि पुनः स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके संघर्ष में मैं अहिंसाके सिद्धान्तपर अविचल रूपसे दृढ़ रहूँ। और यदि भारत इस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता

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