स्वीकार कर लिया, हालाँकि वह काफी नहीं था, तो वह बात समाप्त हो गई थी । मेरा आशय इतना ही था कि कलकत्तेमें और उसके बाद तुमने जो धारणा बनाई, और जिससे तुम्हारी मूल धारणाकी पुष्टि होती थी, वह अनुमानोंपर आधारित थी । लेकिन इस विषय में मैं तुमसे कोई आग्रह नहीं करूँगा । बस इतना ही कि अपने आपको उसके विरुद्ध पूर्वग्रहसे ग्रस्त न हो जाने दो। जहाँतक मेरी बात है, बादके अनुभवसे मेरो यह राय पुष्ट होती है कि वह एक साफ और अच्छा आदमी है । उसके कुछ तौर-तरीके अवश्य ऐसे हैं जो आकर्षक नहीं हैं, लेकिन दुनियामें सर्वथा निर्दोष कौन है ? चलो, इस प्रश्नपर हम दोनोंमें मतभेद ही सही । तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए कि मेरी धारणा सही साबित हो, इसलिए नहीं कि वह मेरी धारणा है, बल्कि इसलिए कि वह मुझे जैसे एक मानवके अनुकूल है ।
मालूम होता है रसिक नहीं बचेगा । अभीतक वह बेहोश और लाचार पड़ा है । यह भयंकर बात है । इस दुःखान्त नाटकका नायक देवदास है । वह उसकी सेवा कर रहा है और जो लोग महज तमाशा देखने दिल्ली गये हैं उन्हें भी सँभाल रहा है । अब रसिककी मौसी भी वहाँ पहुँच गई है। उसे हरिलालके बच्चोंसे बड़ा प्यार है ।
मेरो तबीयत अच्छी है और मैं परिश्रमको बिना कठिनाईके बरदाश्त कर रहा हूँ। अलबत्ता अभी भोजन में दूध नहीं ले रहा हूँ । यात्राके दौरान मैं नारंगी लेता हूँ, लेकिन अन्यथा खुराक साबरमती-जैसी ही है। ठंड सहने योग्य है ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी जी० एन० ९३९६ तथा (सी० डब्ल्यू ० ५३४१) से भी । सौजन्य : मीराबहन
२६. भाषण : सार्वजनिक सभा, जैकोबाबादमें [१]
७ फरवरी, १९२९
गांधीजीने अपने भाषण में विभिन्न समितियों और संगठनोंको लालाजी स्मारक के लिए अपनी-अपनी थैलियाँ देकर अपने देश-प्रेमका परिचय देनेके लिए धन्यवाद दिया, किन्तु साथ ही उन्हें पृथकतावादी प्रवृत्ति पैदा करनेके खतरेसे सावधान भी
किया।[२] उन्होंने पूछा कि आप सभी लोग मिलकर अपनी ओरसे एक संयुक्त थैली
- ↑ १. यह अंश प्यारेलाल द्वारा लिखित साप्ताहिक पत्रमें से लिया गया है। इस सभा में गांधीजीको सात भिन्न-भिन्न संगठनोंकी ओरसे थैलियाँ और अभिनन्दनपत्र भेंट किये गये थे।
- ↑ २. सभाके संयोजकोंने इस भयसे कि सनातनी हिन्दुओंको उसी सभामें ही अछूतोंके शामिल होने पर आपत्ति हो सकती है, अछूतोंकी एक अलग सभाका आयोजन किया था। इसका पता चलने पर गांधीजीने कहा : आप अपनी थैलियाँ और अभिनन्दनपत्र अपने पास रखिए। मैं केवल अछूतोंकी समामें ही भाग लूँगा । और लोग चाहें तो आयें और वहीं अपने अभिनन्दनपत्र भेंट करें। "