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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४३९

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भाषण : सार्वजनिक सभा, जैकोबाबाद में

क्यों नहीं भेंट कर सकते थे ? क्या में इसका यह मतलब लगाऊँ कि आप लोगों को एक भी ऐसा आदमी नहीं मिल सका जिसे आप सब मिल कर अपना प्रतिनिधि स्वीकार कर सकें? फिर मुझसे कहा गया है कि लालाजी स्मारक कोषके लिए लोग और उदारतापूर्वक चन्दा देते, बशर्ते उन्हें यह आश्वासन होता कि सिन्धमें इकट्ठा किये गये धनका एक बड़ा हिस्सा सिन्ध में ही खर्च किया जायेगा। मुझे दिया गया यह सुझाव संकीर्ण दृष्टिकोणका द्योतक है। मैं चाहता हूँ कि आप ऐसा मानें कि भारतकी सेवामें ही सिन्धकी भी सेवा है । और चूँकि इस कोषकी एक-एक पाईका उपयोग भारतकी सेवाके लिए किया जायेगा, इसलिए कोषसे प्राप्त होनेवाले लाभमें सिन्धका अपने चन्देकी हद तक ही नहीं, बल्कि सारे कोषकी हद तक हिस्सा होगा । लालाजीको सवेंट्स ऑफ द पीपुल सोसाइटीको सेवाकी भारतके जिस हिस्सेको भी सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, वह उस सेवाको माँग सकता है। यह सोसाइटी भारतके सभी हिस्सोंसे सदस्य बनानेकी कोशिश कर रही है। यदि सिन्धसे अभीतक कोई व्यक्ति सोसाइटीका सदस्य नहीं बना तो दोष उसका नहीं, सिन्धका ही है । अन्तमें, चूँकि लालाजी स्मारक कोषका एक हिस्सा अस्पृश्यता सम्बन्धी कार्यके लिए नियत है, इसलिए यदि आप सिन्धके अस्पृश्योंमें काम करनेकी एक उपयुक्त योजना तैयार करें तो आप आर्थिक सहायता के लिए कोषके न्यासियोंसे प्रार्थना कर सकते हैं और आपकी माँग पर अनुकूल विचार किया जायेगा। इसके बाद गांधीजीने कार्यकर्ताओंसे जोरदार अपील की कि वे अपने हृदयसे व्यक्तिगत द्वेष, सन्देह और अविश्वासकी भावनाएँ निकाल दें जिसके कारण सिन्धका राजनीतिक वातावरण विषाक्त हो रहा है और सारी उपयोगी गतिविधियाँ लगभग ठप हुई जा रही हैं । उन्होंने कहा, मुझे यह देख कर बहुत पीड़ा पहुँची है कि जयरामदास जैसे व्यक्तिपर भी, जिन्हें मैं भारतका शत-प्रतिशत अच्छा सेवक समझता हूँ, लांछन लगाये गये हैं। परस्पर निन्दा करने के बजाय आप लोगोंको इस वर्षका उपयोग आत्म-शुद्धि करके और कांग्रेसको शुद्ध बनाकर उस अग्नि परीक्षा के लिए तैयारी करनी चाहिए जो आगे होनेवाली है ।

[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २१-२-१९२९