रोककर बैठ जाते हैं। अगर किसीको उनके पाससे होकर संडास तक जाना होता है तो भी वे उसे उठकर रास्ता नहीं देते बल्कि अपने ऊपर से लाँघकर निकल जाने देते हैं। इस तरह रास्ता रोककर बैठना रेलके कायदेके खिलाफ है और अगर दूसरे मुसाफिर विरोध करें तो बैठनेवालेको रास्ता छोड़ना ही पड़े। लेकिन इस नियमका न कोई पालन करता है और न करवाता ही है । जहाँ सब एक ही दोषके शिकार हों वहाँ कौन किसको रोके और कौन किसे पूछे ?
बी० बी० सी० आई० की गाड़ियों में तीसरे दर्जेके पाखाने अच्छे नहीं होते; वे साफ तो होते ही नहीं, फिर मुसाफिर उन्हें और भी खराब कर देते हैं। लेकिन जोधपुर लाइनकी गाड़ियोंमें जैसे खराब पाखाने होते हैं वैसे तो मैंने कहीं भी नहीं देखे । जोधपुर लाइनके पाखाने भीतरसे बन्द नहीं किये जा सकते। उनमें न हवाकी गुंजाइश होती है, न प्रकाशकी ही । मौलाना शौकतअलीके समान मोटा-ताजा आदमी तो शायद ही उनमें घुस सके। इन पाखानोंमें मैलेको बहानेके लिए जो छेद होते हैं वे इतने छोटे होते हैं कि केवल बहुत ही खबरदारी रखनेवाला आदमी आसपासकी बैठकको खराब करनेसे बच सकता है । इस दृष्टिसे जिन्होंने जोधपुर लाइनकी गाड़ियाँ बनाई हैं, उनके दोषोंकी तो हद ही है; लेकिन जो मुसाफिर आज कई सालोंसे इसी हालतको निभाते आ रहे हैं उन्हें क्या कहा जाये ? दुनिया तो यही कहेगी कि ऐसे लोगोंके लिए ऐसे ही पाखाने होने चाहिए। जब रेलवेके मालिकोंका काम बिना पाखाने बनवाये चल जाता है, उन्हें मुसाफिर मिल जाते हैं, तो फिर वे ज्यादा पैसा फिजूल बरबाद क्यों करें ? मैं मानता हूँ कि इस तरहका तर्क सही नहीं है। फिर भी, जो मुसाफिर दूर की जा सकनेवाली तकलीफों को भी सहन कर लेते हैं उनके बारेमें लोग क्या सोचेंगे, क्या सोचते होंगे ?
इस दर्दनाक और शर्मनाक हालतको किस तरह दूर किया जाये ? रेलवे मुसा- फिरोंकी तकलीफोंको दूर करनेके लिए भाई जीवराज नेणसी एक संस्था चला रहे हैं । आज प्रसंगवश मुझे याद आ रहा है कि एक समय जब मुझे दम मारनेकी भी फुरसत न थी, उन्होंने इस बारेमें मुझसे कुछ लिखनेके लिए कहा था । मैं उन्हें यही सलाह देता हूँ कि रेलवे विभागवालोंके पीछे पड़ जाना तो ठीक है ही, लेकिन उनसे भी ज्यादा पीछा तो रेलवे मुसाफिरोंका करना चाहिए, उनकी आँखें खोलनी चाहिए, उन्हें उनके धर्मका भान कराना चाहिए। यह काम धमकाने या डर बतानेसे नहीं हो सकता, इसके लिए प्रेम ही एकमात्र उपाय है। रेलवे विभागवालोंके साथ लिखा- पढ़ी करनेसे सुनवाई हो या न हो, प्रशंसा मिल सकती है । इसमें प्रतिष्ठा है । लेकिन मुसाफिरोंको समझानेमें तो शुरू में बुराई ही हिस्से आयेगी, शायद मार तक खानी पड़े और फिर भी कुछ हासिल न हो। यह काम आन्दोलन करनेका नहीं है, यह तो सुधार और शुद्धिका है। रेलवे विभागके पीछे पड़नेसे विभाग कुछ सुधार करेगा और मुसाफिरोंको बार-बार बताते रहने से वे भी सुधरेंगे, लेकिन यह याद रहे कि यह काम मुश्किल है और धीरे-धीरे होनेवाला है । प्रारम्भमें शायद यह बहुत ही ज्यादा नीरस भी मालूम हो । फिर भी इसमें शक नहीं कि सच्चा सुधार इसी तरह होगा ।