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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४५१

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राक्षसी पद्धति

उस प्रदेशका जिलाधीश । यह बात समझमें आ सकती है कि संरक्षक या जिलाधीश दोनों अधिकारियोंमें एक भी तटस्थ अथवा निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन दोनों अधिकारियोंका काम ऐसे स्टीमरोंका निरीक्षण ही है । वे इन मुसाफिरोंके आरोग्यके लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। इसलिए किसी प्रकारका जुल्म, अन्याय या अनियमितता नहीं हुई, जाँच द्वारा यह दिखाने में तो उनका स्वार्थ है ही । इन अधिकारियोंका स्वार्थ था इसलिए इन्हें तो गुनहगारके कठघरे में खड़ा किया जाना था । इन्होंने अपने कर्त्तव्यका पूरी तरह पालन किया कि नहीं इसकी भी जाँच होनी चाहिए थी। इस तरह अगर व्यावहारिक भाषामें कहें तो गुनहगारको ही न्यायासनपर बैठा दिया गया । ऐसे लोगों द्वारा दिये गये निर्णय में भला क्या कसर हो सकती है ।

ऐसी पद्धतिको मैं राक्षसी पद्धति ही कहूँगा । न्याय करनेके बजाय न्याय करनेका दिखावा करना, हर तरहसे बाह्य आडम्बर करके लोगोंकी आँखोंमें धूल डालना, पहले से ही अपने बचावकी तैयारी कर रखना, जहाँ तक हो सके अपनी मूल स्वीकार न करना, अपराधी अधिकारियोंके अपराध छिपाना, ये सब बातें राक्षसी पद्धतिके लक्षण हैं और ये सब लक्षण हम ब्रिटिश राजनीतिमें रोज देखते हैं ।

सतलज' के प्रश्नपर और ज्यादा विचार करें। जितने व्यक्ति इस यात्रामें मरे यदि उतने हर यात्रामें मरते हैं तो यह बात अधिकारियोंकी निष्ठुरता और निर्दयताको सूचक है। एक ही बार इतने व्यक्तियोंकी मृत्यु हुई हो तो यह आकस्मिक घटना मानी जा सकती है। यदि इतने व्यक्ति हर यात्रामें मरते हों तो यह बात अक्षम्य है और उसका किसी तरह बचाव नहीं किया जा सकता है। इसे अक्षम्य माननेके बजाय अधिकारियोंने उलटा ही किया । यदि कोई पाप और गुनाह रोज होने लगे तो क्या वह पाप और गुनाह नहीं रह जाता ? ऐसा नहीं हो सकता । सतलज ' के प्रसंगसे जो प्रश्न उठते हैं वे इस प्रकार हैं : स्टीमरकी बनावट कैसी है ? उसमें यात्रियोंके रहनेके लिए पर्याप्त स्थान है या नहीं ? रोशनी, हवाका पूरा इन्तजाम है या नहीं ? उसमें ठण्ड, गर्मी बरसातसे बचनेका प्रबन्ध है या नहीं ? यात्रियों के पास काफी कपड़े थे या नहीं ? इन प्रश्नोंका विचार करते समय स्टीमरके मालिक, स्टीमरके कर्मचारियों या दूसरे अधिकारियों, ब्रिटिश गियानाके अधिकारियों और इस विभाग से सम्बन्धित यहाँके अधिकारियोंसे पूछताछ करनेका प्रश्न खड़ा हो जाता है । ऐसी शुद्ध जाँच कौन करे और किसके लिए करे ? गिरमिटमें बँधकर जानेवाले गरीब मजदूरोंका हाल कौन पूछे ? वे मरते हैं या जीते हैं, खाते-पीते कि नहीं, इसका ध्यान कौन रखे ? मण्डलने ' सतलज' की दुखद घटनाकी ओर ध्यान खींचकर अच्छा ही किया है। आशा करता हूँ कि सरकारने अपना बचाव कर लिया है, किन्तु इससे मण्डल सन्तुष्ट नहीं होगा । इस भयंकर घटनाकी खुली और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यह कहने की जरूरत नहीं कि इस जाँच समिति में अधिकारियोंके अतिरिक्त दूसरे व्यक्ति भी होने चाहिए ।

[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, १०-२-१९२९