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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४५६

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४२. पत्र : छगनलाल जोशीको

सक्खर<vr> १० फरवरी, १९२९

चि० छगनलाल,

आशा तो यही है कि यह पत्र तुम्हें बड़े लिफाफेके साथ ही मिलेगा । एक खास व्यक्ति हैदराबाद जा रहा है; उसे उसीके साथ भेजूंगा ।

आन्ध्र प्रदेशके वेंकटप्पैया बहुत अधीर हो रहे हैं; इसलिए दिल्ली से सीधा बैजवाड़ा जानेका विचार कर रहा हूँ। वहाँ तुम्हारा काम ठीक चल रहा है। मेरे आनेसे कुछ व्यवधान तो होगा ही, इसके बजाय तुम्हें एक-दो महीने शान्ति मिल जाये तो वहीं ज्यादा अच्छा रहेगा । आ गया तो भी पाँच दिनसे ज्यादा नहीं रह सकूंगा । इतने थोड़े समय के लिए चक्करका रास्ता क्यों अपनाऊँ। मुझे लगता है कि सीधा मनमाड़के या फिर बम्बईके रास्ते से चला जाऊँ । लेकिन यदि तुम चाहते हो कि मैं पाँच दिनके लिए ही सही मन्दिर आऊँ तो मुझे तार देना या पत्र लिखना । मेरे ख्यालसे यह पत्र तुम्हें बुधवार तक मिलेगा । उसी दिन शामको मैं हैदराबाद पहुँचूँगा । मुझे गुरुवार तक हैदराबादके पतेपर तार कर सकते हो । पत्र तो दिल्ली पहुँचकर ही मिल सकेगा । उस वक्त तक शायद देर हो जायेगी। सबके साथ सलाह करके मुझे सूचित करो ।

अब्बास और राजारामका किस्सा दुःखद माना जायेगा। लेकिन फैसला हो गया यह अच्छा ही हुआ ।

तुम्हें घबराना और निराश नहीं होना चाहिए। कर्त्तव्यका पालन करते रहो ; और फिर भी यदि मन्दिरमें आग लगती है तो लगने दो। अपना सर्वस्व दे देनेके बाद मनुष्य और क्या करे ? परिणाम उसके हाथमें नहीं है । फिर शोक करे और व्यर्थ हाथ-पैर मारे तो मूर्ख ही माना जायेगा । अपनी शक्तिसे ज्यादा कुछ न करना; उतावली तो बिलकुल न करना । सब काम समय पर करना । और जो न हो सके उसके विषय में नम्रतासे अपनी असमर्थता स्वीकार कर लेना । तब सब-कुछ सरल लगेगा ।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी० एन० ५३८६) की फोटो - नकलसे ।