५९. पत्र : वसुमती पण्डितको सक्खर मौनवार, ११ फरवरी १९२९ चि० वसुमती, वलीपेडसे तुम्हारा पत्र मुझे कल ही मिला । इसलिए यह पत्र इस समय तुम्हें मन्दिरके पते पर लिख रहा हूँ ।। दादाके लड़केके देहान्तका साधारण रूपसे उल्लेख करके तुमने ठीक ही किया है । यह मौतके डरसे मुक्त होनेकी निशानी है। रसिककी मृत्युसे मुझे इसका ताजा अनुभव हुआ है । उसकी मृत्युसे होनेवाले दुःखका कारण स्वार्थ ही है । यह रसिकके लिए तो सब प्रकारसे ठीक ही हुआ । उसका शरीर बेकार हो गया था, अन्दरसे सड़ गया था । उसे सँभालकर वह क्या करता ? मौतके सम्बन्धमें इस घटना से पहले ही मैंने 'नवजीवन' में जो कुछ लिखा है उसे पढ़कर विचार करना । यदि हम अपने प्रियजनों की मृत्युके विषयमें निश्चिन्त हो जायें तो अपनी मृत्युके विषयमें उससे भी ज्यादा निर्भय हो जायेंगे और इस महान मित्रसे भेंटके लिए तैयार रहेंगे । अब अपने स्वास्थ्यको चावी अपने हाथमें मानो । चाहे जैसी भी स्थिति हो, मनमें क्लेश न करना । यदि स्थिति न सुधरे तो उसे सहन कर लें। जो सुधर सके उसे सुधार लें। जिस स्थितिमें अनीति हो और जो सहन करने योग्य न हो उससे असहयोग करें। इन तीन बातोंके सिवा चौथी बात नहीं होती । छगनलालको लिखे कलके पत्रसे तुमने देखा होगा कि फिलहाल मेरे मन्दिर लौटनेमें कुछ रुकावट होगी। समय लगेगा । मेरी गाड़ी तो बकरीके दूधके बिना ठीक चल रही है। शायद काम चल जायेगा । गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४२९) की फोटो - नकलसे । सौजन्य : वसुमती पण्डित । बापूके आशीर्वाद
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४६८
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