प्रिय डा० गोपीचन्द, ६५. पत्र : गोपीचन्द भार्गवको सत्याग्रह आश्रम साबरमती १४ फरवरी १९२९ मुझे आपके दो पत्र मिले थे। मैं उनका उत्तर इससे पहले नहीं दे सका, इसके लिए आप कृपया मुझे अशिष्टताका अपराधी न समझें। तथ्य यह है कि मेरे पास उत्तर देने को बहुतसे पत्र बकाया पड़े हैं। अभी परसों जाकर मैं जगन्नाथसे उर्दूकी पाया जो आपने मुझे भेजी है। अब मैं स्थितिको पहलेकी अपेक्षा ज्यादा साफ समझ गया हूँ। मैं मोतीलालजीसे पत्र-व्यवहार कर रहा और शीघ्र ही डा० सत्यपालसे भी सम्पर्क करूँगा । उस कतरनका सारांश ले डा० गोपीचन्द भार्गव बच्छोवाली हृदयसे आपका, लाहोर अंग्रेजी (एस० एन० १५३३५ ) की फोटो - नकलसे । ६६. पत्र : डी० को ' सत्याग्रह आश्रम साबरमती १४ फरवरी १९२९ प्रिय मित्र, मुझे आपका पत्र पुनः प्रेषित होकर सिन्धमें प्राप्त हुआ । मैं आपकी मदद करना चाहूँगा । लेकिन वैसा करूँ, उससे पहले मैं आपके बारेमें थोड़ा और जानना चाहूँगा । मालवीयजीके बारेमें आप जो लिखते हैं वह उनके बारेमें मेरे अनुभवसे कतई विपरीत है । आपका जैसा मामला है उसका उनके ऊपर बहुत अनुकूल प्रभाव पड़ेगा, और मैं जानता हूँ कि वह आपके जैसे मामलोंमें मदद करनेके लिए नियमका आग्रह भी छोड़ सकते हैं। इसलिए मैं ऐसा मानता हूँ कि आपकी शारीरिक अपंगताके अलावा आपमें कुछ और गड़बड़ी होगी, क्योंकि आपकी अपंगताका आपको पढ़ानेकी क्षमतामें १. पूरा नाम यहाँ नहीं दिया जा रहा है।
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४७७
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