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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४८२

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४५० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय बातसे है कि अलमबरदार बड़ी से बड़ी कुर्बानी करनेके लिए तैयार रहते थे। झंडेके सम्मान की रक्षा के लिए अक्सर दुस्साहसपूर्ण बलिदान करनेकी जरूरत हुई है, जिसका एक नमूना मोरक्कोके वे सैनिक हैं जो अपने शस्त्रास्त्र फेंक कर तोपोंकी भयंकर मारकी परवाह न करते हुए अल्लाहके नारेके साथ फ्रांसीसी तोपचियोंकी तरफ झपट पड़े थे। फ्रांसीसी सैनिक मोरक्कोके सैनिकों द्वारा दिखाई गई इस विकट वोरतासे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रशंसामें अपनी टोपियाँ उछालों और उनके साथ दोस्तोंका-सा व्यवहार किया। कांग्रेसजनोंको इसी उदाहरणका अनुकरण करना चाहिए । कांग्रेस-ध्वज फहराने के पीछे यदि हमारा यह दृढ़ संल्कप न हो कि भले ही और सब लोग भाग जायें पर हम अकेले भी इस झंडे को फहराते रखेंगे, तो यह ध्वजारोहण समारोह बच्चोंका एक नाटक-भर रह जायेगा। इसी प्रकार, आपका अपने यहाँ लालाजीके चित्रका अनावरण कराना यदि आपके इस गम्भीर संकल्पका प्रतीक नहीं है कि जिस ध्येय, अर्थात् दासताकी बेड़ियोंसे भारतकी मुक्ति के लिए लालाजी जिये और मरे, उसे पूरा करनेकी खातिर आप अपने प्राणों तकका उत्सर्ग कर देंगे, तो यह कोरी मूर्तिपूजा बन कर रह जायेगा। उनके चित्रको देखकर आपके मनमें उन आदर्शोंके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होनी चाहिए जिनको लेकर लालाजी चले थे, और उसे देखकर आपके लिए कोई ऐसा कार्य करना असम्भव हो जाना चाहिए जो उनकी पुण्य स्मृतिके योग्य न हो। इस प्रकार आपके भवनमें लालाजीके चित्रकी स्थापनाका अर्थ मूर्ति-पूजा नहीं बल्कि वह होना चाहिए, जिसे हम हिन्दू प्राण-प्रतिष्ठा कहते हैं। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २८-२-१९२९