७३. भाषण : भंगियोंकी सभा, हैदराबाद में १४ फरवरी १९२९ सभामें उपस्थित ज्यादातर भंगी गुजरात और राजपूतानाके थे । उनके समक्ष बोलते हुए गांधीजीने कहा कि में भी आप लोगोंमेंसे ही एक हूँ और मेरा पेशा भी भंगीका पेशा है। आप इसे नोच धन्धा न समझें बल्कि इसपर आपको गर्व होना चाहिए । अस्पृश्यताको दूर करनेके काममें जो प्रगति हो रही है उसे देखकर मुझे सन्तोष है । एक समय ऐसा भी था जब किसी आला दर्जेके मन्दिरमें भंगियोंका कोई समारोह आयोजित करने या जमनालालजी के वर्धा-स्थित लक्ष्मीनारायण मन्दिर-जैसे खानगी मन्दिरों में उनको प्रवेश करने देनेकी बात सोची भी नहीं जा सकती थी । लेकिन इस दिशा में अबतक जो प्रगति हुई है वह हालांकि सभीके लिए बधाईके योग्य है, तथापि यह दलित वर्गोंके ही हाथमें है कि वे शराबखोरी, मुरदार जानवरोंका मांस खाने, जुआ खेलने आदि जैसी बुरी आदतोंसे छुटकारा पायें, स्वास्थ्य तथा सफाईके नियमोंका कड़ाई से पालन करें और इस प्रकार सुधारका रास्ता आसान बनायें । संस्कृत और संस्कृतके धर्म-ग्रन्थोंका अध्ययन करना या धर्मकी बारीकियोंको समझना भले ही सबके लिए सम्भव न हो, लेकिन निश्चय ही यह प्रत्येक व्यक्तिका अधिकार और कर्तव्य है कि वह मूल सद्गुणोंको पूरी तरह अपने आचरणमें उतारे। ' [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २८-२-१९२९ १. वादमें गांधीजीने झटिया और कलाल जातिके सदस्योंके सामने भाषण दिया और उनसे आग्रह किया कि वे ऊँच और नीचके उस घृणित भेदभावको मिटा दें जो उनके वातावरणको दूषित कर रहा है और वे अपने समुदायके सभी वर्गोंको एक ही पिताकी सन्तानके रूपमें देखें ।
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