७४. भाषण: कांग्रेसकी सभा, कोटडी में[१]
१४ फरवरी १९२९
गांधीजीने अपने उत्तरमें अध्यक्ष महोदयको उनकी स्पष्टवादिताके लिए धन्यवाद दिया।[२] उन्होंने कहा कि इस समय जब कि हम संघर्षके एक अत्यन्त नाजुक दौरसे गुजर रहे हैं तब कांग्रेस कार्यक्रमके बारेमें निष्क्रियता और अनिश्चयकी मनःस्थितिमें पड़े रहना कांग्रेसजनोंके लिए अपराधस्वरूप है। उन्हें या तो उसे निष्ठापूर्वक कार्यान्वित करना चाहिए और या फिर यदि वे उस कार्यक्रमको अव्यवहार्य अथवा हानिकर समझते हैं तो उन्हें कार्य-समितिको वैसा सूचित कर देना चाहिए। लेकिन मुझसे यह कहना न तो ठीक है और न उपयुक्त हो कि मैं खादी सम्बन्धी धाराको मंसूख करनेका प्रस्ताव करूँ। कांग्रेस संविधान में खादी सम्बन्धी धारा मेरे दबावके कारण तो बरकरार नहीं रखी गई है। गोहाटीमें इस धाराको हटवानेकी कोशिश विफल हो चुकी थी। उस प्रस्तावका विरोध करनेके लिए में वहाँ ठहरा तक नहीं था। मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझे यह सुनकर खुशी जरूर हुई थी कि उस धाराको हटानेका प्रस्ताव नामंजूर कर दिया गया था। मद्रासमें तो इसकी कोशिश भी नहीं की गई, क्योंकि खादीके सवालपर ही चुनाव जीते गये थे। जहाँतक मुझे मालम है, खादी सम्बन्धी धाराके बारेमें किसीने सोचा तक नहीं था। इस प्रकार, कांग्रेस नीतिमें बहुत से परिवर्तन हुए लेकिन खादी सम्बन्धी धारा जनमतके मौन और अव्यक्त दबाव के कारण अपरिवर्तित हो रही है। चूँकि मैं ऐसा मानता हूँ कि यदि अहिंसा और सत्यके तरीकोंसे स्वराज्य प्राप्त करना है तो खादीसे बचा नहीं जा सकता। अतः मैं आपको यही सलाह दे सकता हूँ कि आप आदतन खादीके वस्त्र पहनने की शर्तको कड़ाई से लागू करें, चाहे इसके परिणामस्वरूप कांग्रेसमें केवल एक ही सदस्य बच रहे। बे-मनसे सदस्य बने रहनेवाले एक सौ लोग कांग्रेसके झंडेकी ज्ञान मिट्टीमें मिलायें, इससे कहीं बेहतर है कि एक ही खरा सदस्य हो जो पूरी निष्ठाके साथ कांग्रेसका झंडा ऊँचा रखे। बड़े-बड़े कामोंका इतिहास उन लोगोंका इतिहास है जिनके अन्दर दुनियाके विरुद्ध अकेले खड़े होने का साहस था। दुविधामें पड़ी बड़ी-बड़ी सेनाओं को उत्साह प्रदान करनेके लिए एक अकेले कृष्णकी उपस्थिति काफी थी। वह कभी संख्या-बलपर निर्भर नहीं करते थे। पैगम्बर मुहम्मदने महानताका सर्वोच्च शिखर