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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/४८६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

तब नहीं छुआ था जब सारे अरब देशने सर्वजयी नायकके रूपमें उनकी जय-जयकार की थी बल्कि उस समय छुआ था जब ‘अल्लाहकी खातिर उन्होंने सबसे अलग अकेले खड़े होने में’ भी प्रसन्नताका अनुभव किया था। प्रतापके सब साथी उनको अकेला छोड़ गये लेकिन तब भी, विजयकी कोई आशा न होनेके बावजूद, वह अकेले ही मृत्युपर्यन्त संघर्ष करते रहे किन्तु एक क्षणके लिए भी झंडा नहीं झुकाया। ऐसा ही शिवाजीने भी किया था। और आज दुनिया उनका नाम गर्वके साथ याद करती है। जहाँतक मेरा सवाल है, मैं यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि ईश्वर मुझे शक्ति दे। मैं खादीमें अपनी आस्था सिद्ध कर सकूँ भले ही सब लोग उसका पक्ष त्याग दें। मैं अपने सभी कार्यों में खादी सम्बन्धी कार्यको सबसे अधिक व्यापक सबसे अधिक फलदायी और सबसे अधिक स्थायी मानता हूँ। जब लोग मेरे बारेमें अन्य सब चीजें भूल चुकेंगे तब भी वे मुझे केवल इस एक चीजके कारण याद करेंगे। उदाहरणके लिए, मैं अपने अहिंसा के सन्देश के बारेमें भी यह आशा नहीं रखता कि गैर-हिन्दू लोग उसे सिद्वान्तके रूपमें स्वीकार करेंगे। लेकिन चरखेका मेरा सन्देश समान रूपसे सभी के लिए है―युवा और वृद्ध, हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई और सिख, सभी के लिए। चरखेका सन्देश हमारी भाषाके तानेबाने में ही बुना हुआ है। ईश्वरको सूत्रधार कहते हैं। सूत्रमें पिरोए हुए मोतियोंकी भाँति यह ब्रह्माण्ड भी परमात्मा रूपी डोरेमें पिरोया हुआ है――‘सूत्रे मणिगणा इव।’ इसी प्रकार सूतका धागा ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जो करोड़ों लोगों को एक सूत्रमें बाँध सकता है और जनसाधारण तथा कांग्रेसके बीच अटूट सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। खादीकी उपयोगिता तथा मेरा सबसे अधिक लाभकारी काम क्या है, इसके बारेमें लोग विभिन्न राय रखनेको स्वतन्त्र हैं, लेकिन तब उन्हें मुझे बिलकुल मेरे हालपर छोड़ देना चाहिए; वे मुझे मेरे खादी के सन्देशसे अलग नहीं कर सकते।

इस [भेंटकी थैली] पर[] टिप्पणी करते हुए गांधीजीने कहा कि जब व्यक्ति अपनी सामर्थ्यभर त्याग करके दान देता है तभी उसके दानका महत्व धनकी मात्रासे नहीं, बल्कि दानकी भावनाले आँका जा सकता है। यही बात कंडियाराके वे ६२ छात्र कह सकते हैं जिन्होंने ६५ रुपये भेंट किये थे, लेकिन आप लोगोंने तो जितना दे सकते हैं, उसे देखते कुछ भी नहीं दिया है। इसीलिए में आपका दावा सही माननेसे इनकार करता हूँ और आशा करता हूँ कि आप इस समय भी अपने चन्देकी रकम बढ़ा कर अपनी नाक रख लेंगे।[]

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २८-२-१९२९
  1. कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीने गांधीजीको २०० रुपयेकी थैली भेंट करते हुए आशा व्यक्त की थी कि गांधीजी थैलीकी राशिपर ध्यान न देकर थैली देनेमें निहित भावनापर ही ध्यान देंगे।
  2. इसपर थैलीकी राशि बढ़ाकर ५०० रुपये कर दी गई थी।