बाद हुआ है, इसलिए इन दोनोंके बीच निकटका सम्बन्ध है । उर्दूको मैंने अलग भाषा नहीं गिना, क्योंकि उसके व्याकरणका समावेश हिन्दीमें हो जाता है । उसके शब्द अवश्य अरबी और फारसीके हैं। ऊँचे दरजेकी उर्दू जाननेके लिए अरबी और फारसीका ज्ञान जरूरी है; ठीक इसी प्रकार जैसे ऊँचे दर्जेकी गुजराती, हिन्दी, बंगला, मराठी जाननेके लिए संस्कृतका ज्ञान आवश्यक है ।
६. दुःखद प्रसंग - १
मैं कह चुका हूँ कि हाई स्कूलमें मेरे घनिष्ठ मित्र थोड़े ही थे । जिन्हें घनिष्ठ कहा जा सके विभिन्न समयोंमें मेरे ऐसे दो मित्र रहे । एकका सम्पर्क लम्बे समय तक नहीं चला, यद्यपि उस मित्रका त्याग मैंने नहीं किया था । मैंने दूसरेसे[१] मित्रता की, इसलिए पहलेने मेरा साथ छोड़ दिया। दूसरी मित्रता मेरे जीवनका दुःखद अध्याय है । यह मित्रता काफी बरसों तक चली। इस मित्रतामें मेरी दृष्टि मित्रको सुधारनेकी थी ।
उक्त सज्जन पहले मेरे मँझले भाईके मित्र थे । वे मेरे भाईकी कक्षा में पढ़ते थे । उनमें जो दोष थे उन्हें तो मैं समझ गया था । किन्तु मैंने यह सोचा था कि वे वफा- दार मित्र हैं । मेरी माताजी, मेरे बड़े भाई और मेरी धर्मपत्नी, तीनोंको, मेरा-उनका साथ अप्रिय लगता था । पत्नीकी चेतावनीको अभिमानी पति होनेके कारण में गिनता ही कैसे ? माताकी आज्ञाका मैं कभी उल्लंघन नहीं करता था और बड़े भाईकी बात भी सुनता था । पर मैंने उन्हें यह कहकर मना लिया : " आप उसके जो दोष बताते हैं उन्हें मैं जानता हूँ तथापि आप उसके गुण तो नहीं जानते । वह मुझे उलटे रास्ते नहीं ले जायेगा; क्योंकि मैंने उसका जो साथ किया है सो उसे केवल सुधारनेके लिए किया है। मुझे विश्वास है कि अगर वह सुधर गया तो बहुत अच्छा आदमी बन सकेगा । मैं चाहता हूँ कि आप मेरे विषयमें निश्चिन्त रहें ।
मेरे इस तरह कहने से उन्हें सन्तोष हो गया हो, ऐसा मैं नहीं मानता । किन्तु मुझ पर विश्वास रखकर उन्होंने मुझे अपने मनचाहे रास्ते पर चलने दिया ।
आगे चलकर मैंने देखा कि मेरा अनुमान ठीक नहीं था । किसीका सुधार करनेके लिए ही व्यक्तिको गहरे पानीमें नहीं उतर जाना चाहिए। हम जिसे सुधारना चाहते हैं उसे मित्र नहीं बनाया जा सकता । मित्रतामें अद्वैत-भावना होती है। ऐसी मित्रता संसारमें कदाचित् ही देखनेमें आती है । मित्रता समान गुणवानोंके बीच ही शोभा पाती है और निमती है। मित्रोंका एक-दूसरेके ऊपर असर पड़े बिना रह ही नहीं सकता। इसलिए मित्रतामें सुधार करनेकी गुंजाइश बहुत कम रहती है । मेरा तो यह मन्तव्य है कि घनिष्ठ मित्रता इष्ट नहीं है, क्योंकि मनुष्य दुर्गुणोंको जल्दी ग्रहण कर लेता है और गुण ग्रहण करनेके लिए प्रयत्न आवश्यक होता है ।
- ↑ १. शेख महताब, देखिए खण्ड १, पृष्ठ ६ ।