सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/६४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय



पाणी आपने पाय, भलुं भोजन तो दीजे;
आवी नमावे शीश,दंडवत कोडे कीजे,
आपण घासे दाम,काम महोरोनुं करीओ;
आप उगारे प्राण, ते तणा दुःखमां मरीओ.
गुण केडे तो गुण दश अवगुण केडे जे गुण
गणो, मन, वाचा, कर्मे करी;
करे, ते जगमां जीत्यो सही.[]

११. विलायतकी तैयारी

सन् १८८७ में मैंने मैट्रिककी परीक्षा पास की। देशकी तरह गांधी परिवार भी गरीब ही था । अगर परीक्षाके दो केन्द्र हों -- बम्बई और अहमदाबाद तो पास और सस्ता होनेके कारण काठियावाड़के निवासी अहमदाबादको ही पसन्द करते थे। मैंने भी ऐसा ही किया । राजकोटसे अहमदाबादकी यह मेरी पहली यात्रा थी ।

बड़ोंकी इच्छा थी कि मैट्रिक पास करनेके बाद मुझे कालेज में जाना चाहिए । कालेज बम्बई में भी था और भावनगर में भी। भावनगर में खर्च कम था इसलिए निश्चय हुआ कि भावनगरके शामलदास कालेज में भर्ती हुआ जाये । कालेजकी पढ़ाई मेरी समझ में नहीं आती थी। सभी कुछ कठिन जान पड़ता। अध्यापकगण जो व्याख्यान देते उनमें न रस आता और न मैं उन्हें समझ पाता । इसमें दोष अध्यापकोंका नहीं था मैं खुद ही कमजोर था । शामलदास कालेजके अध्यापक उन दिनोंके चुने हुए अध्यापकों में गिते गाते थे । सत्र पूरा करके मैं घर लौटा ।

हमारे परिवारके पुराने मित्र मावजी दवे विद्वान और व्यवहार कुशल ब्राह्मण थे। वे हम लोगों के सलाहकार थे। पिताजीके स्वर्गवासके बाद भी कुटुम्बके साथ उन्होंने सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होने दिया था । वे अवकाशके इन दिनोंमें घर आये । माताजी और बड़े भाईके साथ बातचीत के दौरान उन्होंने मेरी पढ़ाईके विषय में भी पूछा । यह सुनकर कि मैं शामलदास कालेज में हूँ, वे बोले, " जमाना बदल गया है। अगर तुम भाइयों में से कोई कबा गांधीकी गादी सँभालना चाहे तो अब वह काम बिना पढ़ाईके नहीं होगा। यह लड़का अभी पढ़ रहा है, इसलिए यह गादी सँभालनेके लिए जो-कुछ करना योग्य है इसीसे करवाना चाहिए। चार-पाँच साल तो बी० ए० होने में लग जायेंगे और उसके बाद भी दीवानगीरी नहीं मिलेगी, पचास-साठ रुपयेकी नौकरी मिलेगी। यदि इसे मेरे लड़के की तरह वकील बनाना चाहो तो कुछ और वर्ष लग जायेंगे। और उस समय तक दीवानगीरी सँभालने लायक बहुत-से वकील भी

 
  1. १. " जो हमें पानी पिलाये, उसे हम बदले में स्वादिष्ट भोजन करायें; कोई हमें सिर नवाये तो हम उसे उत्साहपूर्वक दण्डवत् प्रणाम करें; कोई हमपर एक पैसा खर्च करे तो हम उसका मोहरोंकी कीमत का काम करें; कोई हमारे प्राण बचाये तो हम उसके दुःखको दूर करनेके लिए अपने प्राण ही दे डालें। जो हमारा उपकार करे, हमें मन, वचन और कर्मसे उसका दस गुना उपकार करना चाहिए; किन्तु जगमें सचमुच तो वही जीता है जो अपकारीके प्रति भी उपकार करता है। "
    यह छप्पय गुजरातीके प्रसिद्ध कवि शामल भट्टका है, जो १८ वीं सदी में हुए ।