भोजन-गृहके दो विभाग थे - एकमें खाये गये पदार्थोंके हिसाब से पैसे देने होते थे और इसमें एक बारमें शिलिंग, दो शिलिंग तक खर्च हो जाते थे । इस विभागमें अच्छी स्थितिके लोग जाते थे। दूसरे विभागमें छः पैनीमें तीन चीजोंके साथ डबल रोटीका एक टुकड़ा मिलता था। जिन दिनों मैं बहुत अधिक काट-कसर कर रहा था, उन दिनों मैं अकसर इस छ: पैनीवाले विभागमें ही जाता था ।
ऊपरके प्रयोगोंके साथ और भी बहुत-से उप-प्रयोग हुए। कभी श्वेत-सारवाला आहार छोड़ा, कभी सिर्फ रोटी और फल पर ही रहा और कभी पनीर, दूध और अंडों पर ही । यह अन्तिम प्रयोग उल्लेखनीय है । यह १५ दिन भी नहीं चला।</ref>१. २-५-१८९१ को लन्दनमें अन्नाहारपर जो लिखित भाषण पढ़ा था उसमें उन्होंने कहा था कि मुझे खेद है कि मैं डेढ़ माहसे अंडे खा रहा हूँ। देखिए खण्ड १, पृष्ठ ४६ ।</ref> स्टाचरहित आहारका समर्थन करनेवाले (लेखक) ने अंडोंकी बड़ी स्तुति की थी और यह सिद्ध किया था कि अंडा मांस नहीं है । यह तो स्पष्ट ही है कि अंडे खाने में किसी जीवित प्राणीको दुःख नहीं पहुँचता । इस तर्क से भ्रमित होकर मैंने माताजीके सम्मुख की हुई प्रतिज्ञाके बावजूद अंडे खाये; किन्तु मेरा यह मोह क्षणिक ही था । मुझे प्रतिज्ञाका नया अर्थ करनेका कोई अधिकार नहीं था । यह अधिकार तो प्रतिज्ञा करानेवालेका ही माना जा सकता है । मांस न खानेकी प्रतिज्ञा करानेवाली माताके मनमें अंडोंका खयाल ही नहीं आ सकता था। मैं इस बातको जानता था, इस कारण प्रतिज्ञाके इस पहलूका ध्यान आते ही मैंने अंडे छोड़ दिये और उसीके साथ वह प्रयोग भी ।
इसमें एक और सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है । विलायतमें मैंने माँसके विषय में तीन मान्यताएँ पढ़ीं एकके अनुसार मांसका अर्थ पशु-पक्षीका मांस, इसलिए इस तरहकी मान्यता रखनेवाले लोग उसे छोड़कर मछली खाते थे; अंडे तो खाते ही थे। दूसरी व्याख्याके अनुसार साधारण मनुष्य जिसे जीव मानता है उसे खाना छोड़ा जाता था । उसके अनुसार मछली त्याज्य थी, पर उनके लेखे अंडे ग्राह्य थे। तीसरी व्याख्याके अनुसार साधारणतया जिन्हें जीव माना जाता है उनके और उनसे उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंके त्यागकी बात आ जाती थी । इस व्याख्याके अनुसार अंडोंका और दूधका भी त्याग अनिवार्य था । यदि मैं मांसकी पहली व्याख्याको मानता तब तो मछली भी खा सकता था । पर मैं यह बात समझ गया कि मेरे लिए तो माताजीकी व्याख्या ही अनिवार्य है । इसलिए यदि मुझे उनके सम्मुख ली गई प्रतिज्ञाका पालन करना हो, तो मुझे अंडे कदापि नहीं खाने चाहिए। इस कारण मैंने अंडे छोड़ दिये । लेकिन इससे मैं बड़ी कठिनाईमें पड़ गया, क्योंकि बारीकीसे पता चलानेपर मालुम हुआ कि अन्नाहारवाले भोजन-गृहमें भी बहुतसी चीजोंमें अंडा होता है । कहनेका अर्थ यह है कि परिस्थिति-वश मुझे वहाँ भी तबतक परोसनेवालोंसे पूछ-पूछकर ही खाना पड़ा, जबतक खुद मुझे सब-कुछ मालूम नहीं हो गया। कई तरहके 'पुडिंग' और कई तरहके केकोंमें अंडे होते ही थे। एक तरहसे इसके कारण मैं झंझटसे ही बरी हो गया और मेरे लेने योग्य बिलकुल इनी-गिनी और सादी चीजें बच गई ।
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