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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/८२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

दूसरी तरफ मनको कुछ कष्ट भी हुआ क्योंकि जिनका स्वाद लग गया था ऐसी कई चीजोंको छोड़ना भी पड़ा । पर यह कष्ट क्षणिक था । क्षणिक स्वादकी तुलनामें प्रतिज्ञा-पालनका स्वस्थ, सूक्ष्म और स्थायी स्वाद मुझे अधिक प्रिय लगा ।

पर सच्ची परीक्षा तो आगे चलकर होनेवाली थी और वह एक दूसरे ही व्रतके निमित्तसे । 'जाको राखे साइयाँ, मारि न सकिहै कोय । '

अध्यायको समाप्त करनेसे पहले प्रतिज्ञाके अर्थके विषयमें कुछ और कहना भी जरूरी है । मेरी प्रतिज्ञा तो माँके सामने लिया हुआ एक वचन था । दुनिया में बहुत-से झगड़े केवल दिये हुये वचन अथवा किये गये करारके अर्थके कारण पैदा होते हैं । इकरारनामा कितनी ही स्पष्ट भाषामें क्यों न लिखा जाये, भाषामें बारीकी निकालनेवाले तिलका ताड़ बना सकते हैं । सभ्य और असभ्य सभी लोगों में ऐसा होता है । स्वार्थ सबको अन्धा कर देता है । राजासे लेकर रंक तक सभी लोग इकरारोंके ऐसे अर्थ करते हैं जो उन्हें सुविधाजनक हों और फिर इस प्रकार स्वयं अपनेको और भगवानको धोखा देते हैं । सम्बन्धित व्यक्ति जब किसी शब्द अथवा- वाक्यका अपने पक्षमें पड़नेवाला अर्थ लगाते हैं, तब न्यायशास्त्र उसे द्विअर्थी मध्यम पद कहता है । खरा न्याय तो यह है कि वही अर्थ सच्चा माना जाये जो विपक्षीने करार करते समय अपने मनमें माना हो । हम अपने मनमें जो अर्थ छुपाये हुए हैं, वह खोटा अथवा अधूरा है । इसी तरह का दूसरा खरा न्याय यह है कि जहाँ दो अर्थोंकी सम्भावना है, वहाँ ठीक अर्थ वही माना जाना चाहिए, जो दुर्बल पक्ष लगा रहा है। अक्सर इन दो स्वर्ण मार्गोका त्याग होनेपर ही झगड़े होते हैं और अधर्म पनपता है । अन्यायकी जड़ असत्य है । जिसे सत्यके मार्गपर ही चलना है उसे सच्चा रास्ता सहज ही मिल जाता है। इसके लिए उसे शास्त्र नहीं खोजने पड़ते । माताने 'मांस' शब्दका जो अर्थ माना और जिसे मैं उस समय समझ रहा था, वही मेरे लिए सच्चा था। मेरे लिए वह अर्थ सच्चा नहीं था, जिसे मैंने अधिक पढ़-लिखकर अनुभवसे या विद्वत्ताके मदमें सीख लिया था ।

इस समय तक मैंने जो प्रयोग किये, उनमें दृष्टि आर्थिक और आरोग्यकी होती थी । विलायत में उनका स्वरूप धार्मिक नहीं बना था । धार्मिक दृष्टिसे मैंने दक्षिण आफ्रिकामें कठिन प्रयोग किये । उनकी छानबीन आगे करूँगा । पर कहा जा सकता है कि उनका बीज विलायतमें बो दिया गया था ।

जो व्यक्ति कोई नया धर्म स्वीकार करता है उसमें उस धर्मके प्रचारका जोश उसी धर्ममें जन्मे हुए व्यक्तियोंकी अपेक्षा अधिक पाया जाता है । विलायतमें अन्नाहार एक नया धर्म ही था और मेरे लिए भी ऐसा ही कहा जा सकता है। क्योंकि बुद्धिसे मांसाहारका हिमायती बननेके बाद ही मैं विलायत गया था । अन्नाहारको नीतिके रूप में ज्ञानपूर्वक तो मैंने विलायतमें ही अपनाया था। अतएव मेरी स्थिति वैसी ही बन गई जैसे नये धर्ममें प्रवेश करनेवाले व्यक्तिकी बनती है और तद्नुसार मुझमें नवधर्मान्तरितों-जैसा जोश आ गया । इस उत्साहसे प्रेरित होकर मैंने उस बस्ती में जहाँ मैं रहता था, एक अन्नाहारी मण्डलकी स्थापनाका निश्चय किया । इस बस्तीका नाम बेज-वाटर था । सर एडविन आर्नोल्ड यहाँके निवासी थे। मैंने उन्हें