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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/८४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

संवर्द्धक मण्डलमें से किसीका बहिष्कार किया जाना मुझे स्पष्ट ही अन्यायकी बात मालूम हुई। मेरी समझमें स्त्री-पुरुष सम्बन्धी श्री हिल्सके विचारोंका अन्नाहारी मण्डल से कोई सम्बन्ध नहीं था। वे उनके व्यक्तिगत विचार थे और मण्डलके सिद्धान्तों के साथ इनका सम्बन्ध नहीं था । मण्डलका उद्देश्य केवल अन्नाहारका प्रसार करना था, सदाचार आदिका नहीं । इसलिए मेरी यह राय थी कि दूसरी अनेक नीतियोंकी अवज्ञा करनेवालेको भी मण्डलमें स्थान दिया जा सकता है ।

समितिमें मेरे विचारके दूसरे सदस्य भी थे । पर मैं अपने विचार व्यक्त करना ही चाहता था । व्यक्त कैसे करूँ, यह एक बड़ा प्रश्न बन गया । मुझमें भाषण देनेकी हिम्मत नहीं थी, इसलिए मैंने अपने विचार लिखकर सभापतिके सामने रखना तय किया । मैं अपने विचार लिखकर ले गया। जैसा कि मुझे याद है उसे पढ़ सुनानेकी भी मेरी हिम्मत नहीं पढ़ी। सभापतिजीने उसे दूसरे सदस्यसे पढ़वाया। डॉ० एलिन्सनके पक्षकी हार हो गई और मैं इस तरह अपने पहले इस युद्ध में पराजित पक्षमें रहा । किन्तु मैं उस पक्षको सच्चा मानता था, इसलिए मुझे पूरा-पूरा सन्तोष रहा। मुझे कुछ ऐसा ख्याल आता है कि मैंने इसके बाद समितिसे इस्तीफा दे दिया था ।

शरमानेकी मेरी आदत विलायत में अबतक बनी हुई थी । किसीसे मिलने जाता और यदि वहाँ पांच-सात मनुष्य होते तो मैं गूंगा बना बैठा रहता ।

एक बार मैं वैंटनरमें था । वहाँ मजमुदार भी थे । वहाँ एक अन्नाहारी घर था । उसमें हम दोनों रह रहे थे । 'एथिक्स ऑफ डायट ।' (आहार नीति) के लेखक इसी बन्दरगाहमें रहते थे। हम उनसे मिले । अन्नाहारको प्रोत्साहन देनेके लिए एक सभा की गई । उसमें हम दोनोंको बोलनेके लिए आमन्त्रित किया गया। हम दोनोंने इसे स्वीकार किया । मैंने अबतक यह देख लिया था कि लिखा हुआ भाषण पढ़ने में कोई दोष नहीं माना जाता । अपने विचारोंको सिलसिलेसे और संक्षेपमें प्रकट करनेके लिए बहुत-से लोग लिखकर पढ़ देते थे, यह मैंने देखा था । मैंने अपना भाषण लिख लिया। बोलनेकी हिम्मत नहीं थी, इसलिए जब पढ़ने खड़ा हुआ तो पढ़ नहीं सका; आँखोंके सामने अँधेरा छा गया और हाथ-पैर काँपने लगे । मेरा भाषण मुश्किलसे फूलस्केपका एक पृष्ठ रहा होगा । आखिर मजमुदारने उसे पढ़कर सुनाया । मजमुदार खुद तो बहुत अच्छा बोले । बीच-बीच में श्रोतागण उनकी बातोंका स्वागत तालियाँ बजाकर कर रहे थे। मैं लज्जित हुआ और बोलनेकी अपनी असमर्थताके लिए दुखी भी ।

विलायत में सार्वजनिक रूपसे बोलनेका अन्तिम अवसर विलायत छोड़ते हुए मेरे सामने आया । विलायत छोड़ने से पहले मैंने अपने अन्नाहारी मित्रोंको भोजके लिए हाबर्न भोजन-गृहमें निमन्त्रित किया था। मैंने सोचा कि अन्नाहारी भोजन-गृहों में तो अन्नाहार मिलता ही है पर जिस भोजन-गृहमें मांसाहार बनता हो, वहाँ अन्नाहारकी व्यवस्थाका प्रवेश अधिक अच्छा रहेगा। यह विचार करके मैंने इस भोजन-गृहके व्यवस्थापकके साथ विशेष प्रबन्ध करके वहाँ मोजकी व्यवस्था की । यह नया प्रयोग अन्नाहारियोंमें तो प्रसिद्धि पा गया, लेकिन इससे मेरी फजीहत ही हुई । सारी दावतें भोगके लिए होती हैं, पर पश्चिममें इनका विकास एक कलाके रूपमें किया