होगा। यदि इसके बाद भी आपने मुझे अपने घर आने योग्य माना तो मैं इसे आपके प्रेमका एक नया चिह्न समझँगा और इसके योग्य बननेका सदा प्रयत्न करता रहूँगा ।
पाठकगण यह तो समझ ही लें कि पत्र मैंने आनकी आनमें नहीं लिख दिया था । न जाने इसके कितने मसविदे तैयार किये होंगे। यह पत्र भेजनेके बाद मेरे सिरका एक बड़ा बोझ उतर गया । लगभग वापसी डाकसे मुझे उस वृद्धा बहनका उत्तर मिला। उसने लिखा था :
"खुले दिलसे लिखा हुआ तुम्हारा पत्र मिला । हम दोनों खुश हुईं और खूब हँसी । तुमने जो 'असत्य व्यवहार' किया है वह तो क्षम्य ही है । फिर भी यह अच्छा हुआ कि तुमने अपनी सच्ची स्थिति जाहिर कर दी। मेरा आमन्त्रण उसी तरह खुला हुआ है। हम लोग अवश्य ही अगले रविवारको तुम्हारी राह देखेंगी । तुम्हारे बाल-विवाहकी बातें सुनेंगी और तुम्हारा मजाक उड़ाकर आनन्द भी उठायेंगी । यकीन रखो कि हमारी मित्रता जैसी थी वह तो वैसी ही बनी रहेगी ।
इस तरह मेरे अन्तर में असत्यका जो विष भरा हुआ था, मैंने उसे निकाल डाला और इसके बाद मुझे अपने विवाह आदिकी बात बताते हुए कहीं भी परेशानी का अनुभव नहीं हुआ ।
२०. धर्मोसे परिचय
विलायत में रहते हुए कोई एक बरस बीता होगा; इसी समय दो थियासोफिस्ट मित्रोंसे पहचान हुई। दोनों परस्पर सगे भाई थे और अविवाहित थे। उन्होंने मुझसे गीताजीकी चर्चा की। वे एडविन आर्नोल्डका गीताजीका अनुवाद पढ़ रहे थे । पर उन्होंने मुझे उसे मूल संस्कृतमें साथ-साथ पढ़नेके लिए आमन्त्रित किया । मैं लजाया क्योंकि मैंने संस्कृत में या मातृभाषामें गीता पढ़ी ही नहीं थी। मुझे उनसे कहना पड़ा कि मैंने गीता पढ़ी ही नहीं है, फिर भी मैं उसे आपके साथ पढ़नेकी तैयार । संस्कृतका मेरा अभ्यास भी नहींके बराबर है । मैं उसे इतना ही समझ सकता कि यदि अनुवाद में कहीं कोई गलत अर्थ होगा, तो उसकी ओर इशारा कर सकूंगा । इस प्रकार मैंने उन भाइयोंके साथ गीता पढ़ना शुरू किया। दूसरे अध्यायके अन्तिम श्लोकों में से इन श्लोकोंका मेरे मनपर गहरा असर पड़ा :
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
क्रोधाद् भवति संमोहः समोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।[१]
- ↑ १. विषयका चिन्तन करनेवालेको पहले उन विषयोंके प्रति आसक्ति उपजती है, आसक्तिसे कामना जन्म लेती है, और कामनासे क्रोष उत्पन्न होता है। क्रोध में से संमोह, संमोह में से स्मृति-भ्रम और स्मृति-भ्रमसे बुद्धि-नाश होता है और अन्ततोगत्वा उस व्यक्तिका ही नाश हो जाता है।