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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/९

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भूमिका

इस खण्ड में गांधीजीकी आत्मकथा आती है और अवधिके विचारसे इसमें केवल ३ फरवरीसे लेकर १४ फरवरी १९२९ तक १२ दिनकी ही सामग्री है। इन दिनों गांधीजी सिन्धमें लाजपतराय स्मारकके लिए धन इकट्ठा कर रहे थे और साथ ही प्रान्तके कांग्रेस-कार्यकर्त्ताओंके मतभेदोंको भी दूर कर रहे थे ।

९ फरवरोको गांधीजीको समाचार मिला कि एक दिन पहले दिल्लीमें उनके पौत्र, रसिकका निधन हो गया है। उन्होंने इस मानसिक पीड़ाके कारण अपने दैनिक कार्यक्रम में एक क्षणका भी व्यवधान नहीं होने दिया। क्योंकि उनके विचारमें किसी प्रियजनकी मृत्युका दुःख मोहका ही स्वरूप होता है । (पृष्ठ, ४११-१२, ४१३)

टॉल्स्टॉय के एक मित्र और अनुगामी चेरकोफने इस बातपर दुःख प्रकट किया कि गांधीजीने कभी पहले इंग्लैंडके युद्ध-प्रयत्नोंमें हाथ बँटाया था और अभीतक उसे उचित मानते हैं। गांधीजीने उत्तरमें यह दलील दी कि युद्ध-विरोधियोंको भी परस्पर सहिष्णुतासे काम लेना चाहिए। इस प्रश्नपर गांधीजीके इस प्रकारका रुख अपनानेका एक कारण तो उनका यह विश्वास था कि भारत अपनी विशिष्ट परिस्थितिमें वीरोंकी अहिंसा अपनाने में असमर्थ है और इसलिए वह नैतिक आधारपर युद्ध विरोध नहीं कर सकता। उन्होंने कहा: “मैं तो यही अनुभव करता हूँ कि मैं जिस माध्यमसे शान्तिके दर्शन कर रहा हूँ, मेरे यूरोपीय मित्र उससे सर्वथा अपरिचित हैं । मैं एक ऐसे देशका निवासी हूँ, जिसे बलात् निरस्त्र कर दिया गया है और जिसे सदियोंसे दास बनाकर रखा गया है । क्योंकि हम लोग दुर्बल हैं इसलिए अहिंसाको समझना हमारे लिए आसान नहीं है ।" (पृष्ठ ४०१)

यह खण्ड अधिकांशमें तो 'आत्मकथा' ही है । 'आत्मकथा' गांधीजीकी रचनाओं में सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय ग्रन्थ है और वह उनके जीवनको जाननेका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माध्यम भी है। मूल गुजराती आत्मकथा साप्ताहिक किस्तों में २९ नवम्बर १९२५ से ३ फरवरी १९२९ तक 'नवजीवन' में प्रकाशित हुई थी । महादेव देसाई और कुछ अंशो प्यारेलाल नैयर द्वारा किया गया उसका अंग्रेजी अनुवाद ३ दिसम्बर १९२५ से ७ फरवरी १९२९ तक 'यंग इंडिया' के अंकोंमें क्रमशः प्रकाशित हुआ था। गांधीजीने अपने कुछ सहयोगियोंकी प्रेरणासे इस कामको प्रारम्भ किया था। यह सुझाव सन् १९२१ में ही गांधीजीके सामने रखा गया था किन्तु १९२५ में जब गांधीजी किसी और समयकी तुलना में अन्यान्य कामोंसे कुछ मुक्त नजर आ रहे थे तब उन लोगोंने अपना यह आग्रह और ज्यादा जोर देकर दुहराया। चूंकि गांधीजी यह भली-भाँति जानते थे कि कदाचित् ही कोई आत्मकथा ऐसी लिखी जा