वे मेरे कानोंमें गूंजते ही रहे। उस समय मुझे लगा कि भगवद्गीता अमूल्य ग्रन्थ है । धीरे-धीरे यह मान्यता बढ़ती गई और मैं आजतक ज्ञान प्राप्त करनेके लिए उसे सर्वोत्तम ग्रन्थ मानता हूँ। अपनी निराशाके समय में मुझे इस ग्रन्थने अमूल्य सहायता प्रदान की है। मैं इसके लगभग सभी अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका हूँ । किन्तु मुझे एडविन आर्नोल्डका अनुवाद श्रेष्ठ लगता है । उसमें मूल ग्रन्थके भावकी रक्षा की गई है और फिर भी वह ग्रन्थ अनुवाद जैसा नहीं लगता । यह तो कहा ही नहीं जा सकता कि उन दिनों मैंने भगवद्गीताका अध्ययन किया । मेरे नित्य पाठका ग्रन्थ तो वह कई वर्षोंके बाद बना ।
इन्हीं सज्जनोंने मुझे सुझाया कि मैं आर्नोल्डका बुद्ध चरित्र पढ़ें । उस समय तक मैं केवल सर एडविन आर्नोल्डके गीताके अनुवादकी बात ही जानता था । मैंने बुद्ध चरित्र और भी अधिक डूबकर पढ़ा। पुस्तक हाथमें लेनेके बाद उसे समाप्त करके ही छोड़ सका। एक बार मैं इन दोनोंके साथ ब्लैक्ट्स्की लाजमें भी गया । वहाँ उन्होंने मुझे मैडम ब्लैक्ट्स्की और श्रीमती बेसेंटके दर्शन कराये । श्रीमती बेसेंट उन्हीं दिनों थियोसोफिकल सोसाइटीमें शामिल हुई थी, इसलिए समाचारपत्रों में तत्सम्बन्धी जो चर्चा चलती थी उसे मैं दिलचस्पीके साथ पढ़ा करता था । इन भाइयोंने मुझे सोसाइटीमें शामिल होजानेका सुझाव भी दिया। मैंने नम्रतापूर्वक इन्कार करते हुए कहा, "मैं धर्मके विषय में लगभग कुछ नहीं जानता, इसीलिए मैं किसी भी पंथ में शामिल होना ठीक नहीं समझता।" मुझे कुछ ऐसा ख्याल आता है कि इन्हीं भाइयोंके कहने से मैंने मैडम ब्लैक्ट्स्कीकी पुस्तक 'की टु थियोसाफी' (थियोसाफीकी कुंजी) पढ़ी थी। उसके कारण हिन्दू धर्मकी पुस्तकें पढ़नेकी इच्छा हुई और उन्हें पढ़नेके बाद पादरियोंसे सुना हुआ यह ख्याल कि हिन्दू धर्म अन्धविश्वासोंसे ही भरा हुआ है, दिलसे निकल गया ।
इन्हीं दिनों एक अन्नाहारी छात्रावास में मुझे मैंचेस्टरके एक ईसाई सज्जन मिले। उन्होंने मुझसे ईसाई धर्मकी बातें कीं । मैंने उन्हें राजकोटका अपना संस्मरण सुनाया । वे सुनकर दुखी हुए। उन्होंने कहा, " मैं स्वयं अन्नाहारी हूँ । शराब भी नहीं पीता । यह सच है कि बहुत-से ईसाई मांस खाते हैं और शराब पीते हैं; पर ईसाई धर्ममें इन दोनोंमें से किसी एक भी वस्तुका सेवन करना कर्त्तव्य नहीं है । मेरी सलाह है कि आप बाइबिल पढ़ें।" मैंने उनकी सलाह मान ली। उन्होंने मुझे बाइबिल लाकर दी। मुझे कुछ ऐसा ध्यान है कि उक्त सज्जन बाइबिल विक्रेता थे । उन्होंने जो बाइबिल मुझे दी थी उसमें नक्शे, अनुक्रमणिका सभी कुछ था । मैंने उसे शुरू किया । पर मैं 'पुराना करार' (ओल्ड टेस्टामेंट) पढ़ ही नहीं सका । 'जेनेसिस' रचनाके प्रकरणके बाद तो मुझे नींद ही आ जाती थी। मुझे याद है कि मैंने बिना किसी दिलचस्पीके और बिना समझे सिर्फ यह कह सकनेके लिए कि मैंने बाइबिल पढ़ी है, दूसरे कई प्रकरण भी बड़ी मुश्किलसे पढ़े थे । 'नम्बर्स' नामक प्रकरण पढ़ते हुए तो मैं बिलकुल ही ऊब गया ।
पर जब 'नये करार' (न्यू टेस्टामेंट) पर आया, तो एक अलग ही प्रभाव पड़ा। ईसाके 'गिरि-प्रवचन' (सरमन ऑन द माउन्ट) का मुझपर बहुत अच्छा असर