जानता हूँ। मैंने बंगालमें भ्रमण किया है। महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुरकी पुस्तकोंके अनुवाद मैंने ही गुजराती जनताको दिये हैं। मैं गुजराती जनताको कई भाषाओंसे अनुवाद देना चाहता हूँ । अनुवाद करते हुए मैं शब्दार्थसे नहीं चिपकता, भावार्थ देकर सन्तुष्ट हो जाता हूँ । मेरे बाद कोई और इससे अधिक दे तो ठीक है । मैं बिना व्याकरण जाने भी मराठी जानता हूँ, हिन्दी जानता हूँ और अब अंग्रेजी भी समझने लगा हूँ । मुझे तो शब्द भण्डार चाहिए। यह मत समझना कि सिर्फ अंग्रेजी जानकर ही मुझे सन्तोष हो जायेगा । मुझे फ्रांस जाकर फ्रेंच भी सीखनी है । मैं जानता हूँ कि फ्रेंच भाषाका साहित्य विशाल है । यदि हो सका तो जर्मनी भी जाऊँगा और जर्मन भाषा सीखूंगा ।" नारायण हेमचन्द्रकी वाग्वारा इसी प्रकार चलती रही । भाषाएँ सीखने और यात्रा करनेकी उनकी उत्सुकताकी सीमा नहीं थी ।
"तब तो आप अमेरिका भी जरूर ही जायेंगे ? "
"जरूर । उस नई दुनियाको देखे बिना मैं वापस कैसे लौट सकता हूँ ?"
" पर आपके पास इतने पैसे कहाँ हैं ?"
"मुझे पैसोंसे क्या लेना-देना ? मुझे तुम्हारी तरह टीम-टामसे थोड़े ही रहना है । मुझे खाना ही कितना है और पहनना ही कितना है ? अपनी किताबोंसे मुझे जो कुछ मिल जाता है और मित्रगण जो थोड़ा-सा दे देते हैं वह काफी हो जाता है । मैं सब कहीं तीसरे दर्जे में ही जाता हूँ । अमेरिका यात्रा डेक पर करूँगा ।"
नारायण हेमचन्द्रकी सादगी तो उनकी अपनी ही थी । वे जितने सादे थे, उतने ही अकृत्रिम भी । अभिमान नामको भी नहीं था । लेखककी तरह अपनी शक्तिपर उन्हें जितना चाहिए उससे भी अधिक विश्वास था ।
हम रोज मिलते । हमारे बीच विचार और आचारका काफी हद तक साम्य था । हम दोनों अन्नाहारी थे। दोपहरका भोजन अक्सर साथ ही होता । यह मेरे उस कालकी बात है, जब मैं प्रति हफ्ते १७ शिलिंग में निर्वाह करता था और भोजन हाथसे बनाता था । कभी मैं उनके मुकाम पर जाता, तो कभी वे मेरे घर आ जाते । मैं रसोई अंग्रेजी ढंगकी बनाता था, किन्तु उन्हें देशी ढंगकी रसोईके बिना सन्तोष नहीं होता था । दाल तो उनके लिए जरूरी ही थी । मैं गाजर वगैराका सूप बनाता। उन्हें इससे मुझपर दया आती । वे कहींसे मूंग खोज लाये और एक दिन उसे उन्होंने मेरे लिए पकाया भी। मैंने उसे बड़े चावसे खाया। फिर तो खाद्य पदार्थोंका हमारा यह लेन-देन और भी बढ़ा। मैं उन्हें अपने बनाये पदार्थ चखाता और वे मुझे अपने बनाये हुए ।
कार्डिनल मैनिंगका नाम उन दिनों सबकी जबान पर था । गोदी-मजदूरोंने हड़ताल कर रखी थी। जॉन बर्न्स और कार्डिनल मैनिंगके प्रयत्नसे यह हड़ताल जल्दी ही समाप्त हो गई। डिजरॅलीने कार्डिनल मैनिंगकी सादगीके विषयमें जो लिखा था, सो मैंने नारायण हेमचन्द्रको सुनाया ।
"ऐसे साधु पुरुषसे तो मुझे मिलना ही चाहिए। "
" वे तो बहुत बड़े आदमी हैं । आप उनसे कैसे मिलेंगे ? "