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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 39.pdf/९६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

" मैं बतलाता हूँ किस तरह । तुम मेरे नामसे एक पत्र लिखो । मेरा परिचय देते हुए लिखो कि मैं एक लेखक हूँ और उनके परोपकारका अभिनन्दन करनेके लिए स्वयं उनसे मिलना चाहता हूँ । यह भी लिखो कि मैं अंग्रेजी नहीं बोल सकता, इसलिए मैं दुभाषिएकी तरह तुम्हें साथ ले जाऊँगा । "

मैंने उन्हें इस आशयका पत्र लिखा । दो-तीन दिनमें जवाब में एक कार्ड आया । उन्होंने मिलनेका समय दे दिया था । हम दोनों गये। मैंने रिवाजको देखते हुए मुलाकातकी पोशाक पहन ली थी, पर नारायण हेमचन्द्र तो जैसे रहते थे वैसे ही गये। वही कोट और वही पतलून । मैंने मजाक किया, तो उन्होंने मेरी बातको हँसकर उड़ा दिया और बोले :

तुम 'सभ्य' लोग सबके सब डरपोक हो । महापुरुष किसीकी पोशाक नहीं देखते । वे तो दिल परखते हैं । "

हमने कार्डिनलके महल में प्रवेश किया। उनका घर महल ही था । हमारे बैठ जानेपर एक बहुत दुबले-पतले, बूढ़े और ऊँचे पुरुषने कमरेमें प्रवेश किया। उसने हम दोनोंसे हाथ मिलाया, नारायण हेमचन्द्रका स्वागत किया ।

" मैं आपका समय नहीं लूंगा। मैंने तो आपके विषय में सुना था। हड़तालमें आपने जो काम किया है मैं उसके लिए आपका उपकार मानना चाहता था । मेरा नियम है कि मैं संसारके साधु पुरुषोंका दर्शन करता रहता हूँ । इस कारण मैंने आपको इतना कष्ट दिया ।"

नारायण हेमचन्द्रने इतना कहकर मुझसे कहा कि मैं इन वाक्योंका अनुवाद कर दूं ।

" आपके आने से मुझे खुशी हुई। आशा है, आपका यहाँका मुकाम सुखपूर्ण रहेगा और आप यहाँके लोगोंसे परिचय प्राप्त करेंगे। ईश्वर आपका कल्याण करे । "

यह कहकर कार्डिनल खड़े हो गये ।

एक बार नारायण हेमचन्द्र मेरे निवास पर धोती-कुरता पहनकर आये । बेचारी घर-मालकिनने दरवाजा खोला तो डर गई । पाठकोंको याद होगा ही कि मैं घर बदलता रहता था इसीलिए यह महिला नारायण हेमचन्द्रको नहीं जानती थी । मेरे पास आकर बोली, "कोई पागल-सा आदमी तुमसे मिलना चाहता है ।" मैं द्वारपर पहुँचा तो नारायण हेमचन्द्रको पाया। मैं हैरान रह गया । पर वे तो सिर्फ हँस रहे थे ।

"लड़कोंने आपको तंग नहीं किया ? "

जवाबमें वे बोले : " मेरे पीछे दौड़ते रहे, मैंने कुछ ध्यान नहीं दिया तो रह गये । "

नारायण हेमचन्द्र कुछ महीने इंग्लैंड रहकर वहाँसे पेरिस गये । वहाँ फ्रेंच भाषा- का अध्ययन किया और फ्रेंच पुस्तकोंका अनुवाद करने लगे। उनके अनुवादको देख लेने लायक फ्रेंच मैं जानता था, इसलिए उन्होंने उसे देख जानेको कहा। मैंने देखा कि वह अनुवाद नहीं था, भावार्थ था ।