रुपालसे मैं शाम के भोजनका समय बदल रहा हूँ। अन्य कोई समय अनुकूल नहीं है क्योंकि मैं सूर्यास्तके बाद नहीं खाता।
- [अंग्रेजीसे]
- हिन्दू, ७-३-१९२९
६५. काम-विकारको कैसे जीतें
काम-विकारको जोतनेका प्रयत्न करनेवाले एक पाठक लिखते हैं:[१]
इन पाठककी भाँति और भी कई लोगोंकी यही हालत है। कामको जीतना कठिन अवश्य है पर असम्भव नहीं। लेकिन प्रभुका कथन है कि जो कामको जीत लेता है वह संसारको जीत लेता है और भवसागरसे पार हो जाता है। सो हम देखते हैं कि कामपर जय पाना सबसे कठिन बात है। लेकिन काम-विजयकी कोशिश करनेवाले बहुत से लोग यह स्वीकार नहीं करते कि ऐसे कठिन उद्देश्यको पानेके लिए धीरज बहुत ही अधिक जरूरी रहता है। हम जानते हैं कि अक्षर-ज्ञानसे लेकर किसी विषयका ठीक अध्ययन कर पानेके लिए लगन, धीरज और एकचित्त होनेकी कितनी आवश्यकता पड़ती है। इस परसे अगर हम हिसाब लगा कर देखें तो हमें पता चले कि केवल ऐसे शाब्दिक ज्ञानको पाने में धीरज आदिकी जितनी जरूरत होती है उसके अनन्त गुनी ज्यादा धैर्यकी जरूरत काम-विजयके लिए होती है।
यह तो हुई धीरजकी बात। इसी प्रकार हम काम-विजयके अन्य अनेक उपायोंके बारेमें भी उदासीन रहते हैं। साधारण बीमारीको दूर करनेके लिए दुनिया-भरकी धूल छान डालते हैं; डाक्टरोंके घर-घर भटकते हैं; जन्तरमन्तर तक नहीं छोड़ते; लेकिन काम-रूपी महारोगको मिटानेके लिए जितने चाहिए उतने उपाय-उपचार हम नहीं करते। थोड़ा-बहुत करके थक जाते हैं और उलटे ईश्वरके साथ या उपाय बतानेवाले के साथ शर्त करते हैं कि इतनी चीज तो नहीं ही छोड़ेंगे, फिर भी काम-विकारको मिटाना होगा। तात्पर्य, काम-विकारको नष्ट करनेकी सच्ची व्याकुलता हममें नहीं होती है। उसके लिए सर्वस्व न्योछावर करनेके लिए हम तैयार नहीं होते। हमारी यह शिथिलता काम-विकारको जीतने के मार्ग में एक बहुत बड़ी रुकावट है। यह सच है कि निराहारीके विकार शान्त हो जाते हैं। लेकिन आत्मदर्शनके बिना आसक्तिका नाश नहीं होता। लेकिन उक्त श्लोकका[२] अर्थ यह नहीं है कि काम- विजयके लिए निराहार निरर्थक है। उसका अर्थ तो यह है कि आहार विषयक संयममें कभी प्रमाद नहीं करना है; हो सकता है उस तरह की दृढ़ता और लगनसे आत्मदर्शन हो जाये। उसके होते ही आसक्ति भी मिट जायेगी। इस तरहका निराहार किसी दूसरेके कहने से नहीं लिया जा सकता, न आडम्बरकी खातिर ही मंजूर किया जा सकता है। इसके लिए तो मन, वचन और शरीरका सहयोग जरूरी है। अगर यह