सहयोग सब जाये तो ईश्वरकी प्रसादी अवश्य ही मिले और प्रसादी मिल जाये तो फिर विकार तो शान्त होंगे ही।
लेकिन निराहार व्रत से पहले के कई हलके उपाय भी हैं। उनका आश्रय लेनेसे अगर विकार शान्त न भी हों तो कमसे कम कमजोर तो जरूर ही हो जायेंगे। अतः भोग-विलासके सारे अवसरोंका एकान्त त्याग कर देना चाहिए। उनके प्रति अभाव बुद्धि जागृत करनी चाहिए। क्योंकि अभाव विहीन त्याग सिर्फ बाहरी त्याग होगा और इस कारण चिरस्थायी नहीं हो सकेगा। यहाँ यह बताने की जरूरत तो होनी ही नहीं चाहिए कि भोग-विलास किसे कहा जाये। जिन चीजोंसे विकार पैदा हों उन सबका त्याग किया जाना चाहिए।
इस सिलसिले में आहारमें क्या लिया जाये, क्या नहीं, यह सवाल भी बहुत विचारणीय है। अभी यह क्षेत्र अछूता पड़ा है। मेरे विचारमें विकारोंको शान्त करनेकी इच्छा रखनेवालोंको घी-दूधका कमसे कम उपयोग करना चाहिए। वनपक्व अनाज खाकर अगर जीवन निर्वाह किया जा सके तो कृत्रिम अग्निके संसर्गसे तैयार की गई खुराक न ले, अथवा बहुत थोड़ी ले। फल और कई प्रकारकी हरी शाक-सब्ज़ियाँ बिना रांधे भी खाई जा सकती हैं और खाई जानी चाहिए। लेकिन बिना आग पर पकाई हरी शाकको खुराकका प्रमाण बहुत थोड़ा रखना चाहिए। दो-तीन तोला ऐसी हरी शाकसे काफी पोषण मिल जाता है। मिठाई, मसालों वगैराका एकदम त्याग कर देना चाहिए। इतना बता चुकनेपर भी मैं जानता हूँ कि सिर्फ खुराकसे ही ब्रह्मचर्यकी पूरी रक्षा नहीं हो सकती। लेकिन विकारोत्तेजक खुराक खाते हुए तो मनुष्य ब्रह्मचर्य पालनकी आशा न रखे; उसे रखनी ही नहीं चाहिए।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, ३-३-१९२९
६६. बहिष्कार
विदेशी कपड़ेके बहिष्कारकी हलचलके सम्बन्धमें एक शुभ-चिन्ह तो यह है कि श्री जयरामदासने बम्बईकी धारासभा में अपनी जगह से इस्तीफा देना और बहिष्कार समितिका मन्त्रिपद सँभालना स्वीकार कर लिया है। पाठकोंको इस निश्चयसे प्रसन्नता होगी। बहिष्कार समितिको दिल्लीमें ही इस वातकी आवश्यकता प्रतीत हुई थी कि सम्बन्धित कामके बारेमें दिन-रात विचार करने और उसे करनेके लिए एक मन्त्री होना चाहिए। मुझे फौरन ही श्री जयरामदासका खयाल आया। मैं मानता हूँ कि इस कामके लिए वे बहुत योग्य हैं। इसलिए मैंने उन्हें एक छोटा-सा पत्र[१] ही लिखा कि इस महान कार्यके लिए यदि आप धारासभा छोड़ दें तो अच्छा हो। उन्होंने मुझे तारसे जवाब दिया कि "आपसे मिलने आ रहा हूँ।" वे इस्तीफा देनेका निश्चय करके हो बम्बई से रवाना हुए। मेरे साथ कुछ सलाह-मशविरा करके अब वे उसकी
- ↑ देखिए "पत्र: जयरामदास दौलतरामको", २१-२-१९२९।